Tuesday, 29 July 2014

मेहंदी के मौसमों में.......................






















मेहंदी के मौसमों में,
त्यौहारों के दिनों में,
घेवर की खुशबुओं में,
सावन के लहरियों में,
इन्द्रधनुष के रंगों में,
और पीहर के सब प्रसंगों में,
अब कुछ कमी सी है.......
बाबा! तुम्हारे बिना,
दुनिया चल भी रही है...
फिर भी थमी सी है ............


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माँ को नहीं आता था मेहंदी मांडना,
वो हथेली में मेहंदी रख के कर लेती थी मुट्ठियाँ बंद,
मेरी तीज, मेरे त्यौहार,
सब माँ के हाथों में रच जाते थे इस तरह ...........
शगुन का यह खा ले,
शगुन का यह पहन ले,
माँ करा लेती थीं, न जाने कितने शगुन,
पीछे दौड़ भाग के.......
रचा देती थीं मेरे भी हाथों में मेहंदी,
चुपके से आधी रात को.......,

माँ,
मैंने नहीं सीखा तुम्हारे बिना, त्यौहार मनाना, ......
शगुन करना, मीठा बनाना, मेहंदी लगाना,
तुम डाँटोगी फिर भी.....
अब हर तीज, हर त्यौहार,
मैं जी रही हूँ तुम्हारा वैधव्य तुम्हारे साथ ................


 (चित्र गूगल से साभार )

Saturday, 26 July 2014

कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं.................

कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं,
जो मिलते हैं वहीँ,
जहां छोड़कर हम उन्हें,
आगे निकल जाते हैं ...........

वो रोकते नहीं,
पीछे से आवाज़ देकर अपशकुन नहीं करते,
बाधा भी नहीं बनते राह की,
बस इंतज़ार करते हैं,
हमारे लौटने का,
हमारे लौटने तक........

वो कुछ रिश्ते,
दूरी के परे,
समय के परे,
शब्दों के परे,
तर्कों के भी परे.....

वो कुछ माँगते नहीं,
कुछ चाहते नहीं
बस सहेज के रखना होता है उन्हें,
जैसे उम्र भर माँ सहेजती है बच्चों की छोटी छोटी चीज़ें....
थोड़ी क़द्र करनी होती है,
और वो मिलते हैं वहीँ हर बार,
जहां छोड़कर हम उन्हें, आगे निकल आये थे...............



Tuesday, 22 July 2014

बच्चे परिणामों की फ़िक्र नहीं करते....................

बच्चों को नहीं आता खुद को समझाना,
उन्हें समझदारी का तमगा नहीं लुभाता,
वो बस जानते हैं मचलना, ज़िदें करना,
बीच सड़क पे फ़ैल जाना,
अपनी पसंद के खिलौनों के लिए....................

बच्चे नहीं देखते की उन्हें देख रहा है कोई,
उनकी शैतानियों पे, बदमाशियों पे,
नहीं पड़ता फ़र्क़ किसी की तीखी नज़र से,
वो नहीं मानते किये बिना,
जो ठान लें एक बार करने का......................


बच्चे नहीं चाहते सुनना की कौन क्या कह रहा है उनके बारे में,
वो अपनी आवाज़ कम नहीं करते,
वो चिल्लाते हैं, गाते हैं,
रोते हैं, बातें करते हैं,
दिल और गला खोल कर....................

बच्चे नहीं सोचते कुछ कहने से पहले,
वो कह देते हैं सीधी सच्ची दिल की बात,
किसी के भी सामने बिना किसी डर के,
बच्चे परिणामों की फ़िक्र नहीं करते....................

बच्चे नहीं बनाते योजनाएं,
क़दम उठाने से पहले,
वो बस निकल पड़ते हैं,
बच्चों के पास नहीं होता वक़्त,
रुकने का सोचने का................

बस एक बार फिर बच्ची बन जाऊं मैं,
तो फ़ेंक दूँ, दूर सर से उठाकर समझदारी के टोकरे,
सीखूं फिर से ज़िदें करना, मचलना, चिल्लाना, गाना, रोना, बातें करना,
निडर हो, मन से जीना, मन का करना,
परिणामों की सुध लिए बिना,
कदम उठाना और बस निकल पड़ना.................................

Monday, 21 July 2014

मैं देह नहीं हूँ..............



मैं देह नहीं हूँ........
मैं केवल देह नहीं हूँ.......
मैं मन हूँ, मैं आत्मा हूँ, विचार भी हूँ,
मैं इस सृष्टि पर हर सांस का आधार भी हूँ,
मैं केवल एक रिश्ता ही नहीं हूँ,
मैं श्रद्धा हूँ, विश्वास हूँ, प्यार भी हूँ,
मैं उपकरण नहीं हूँ सारने संभालने का,
मैं प्रार्थना हूँ, आशीष हूँ, दुलार भी हूँ,
मैं दायित्व नहीं उठाने निभाने को,
मैं शुभकामना हूँ, समझ हूँ, आभार भी हूँ,
मैं केवल देह नहीं हूँ,
मैं शक्ति हूँ, मैं भक्ति हूँ, संसार भी हूँ,
मैं एक किस्सा नहीं हूँ, सुनने सुनाने को,
मैं आदि हूँ, अंत हूँ, अपार भी हूँ,
मैं देह नहीं हूँ, मैं केवल देह नहीं हूँ,
मैं जीवन हूँ और,
मैं जीवन का सार भी हूँ...........................................

 (चित्र गूगल से साभार )

Friday, 18 July 2014

पुराना स्कूटर....................

पुराना स्कूटर

एक पुराना स्कूटर था,
पीछे गली में रखा रहता था,
आज अचानक याद आ गया.....

याद आ गया जब वो आया था,
कितनी बड़ी बात थी,
हम सब बच्चों के लिए..........

पोछना चमकाना उसको,
पापा के दफ्तर जाने के लिए
तैयार करना उसको...........

दरवाज़ा खोलना उसके लिए
जाते हुए देखना उसे,
ओझल होने तक गेट पर खड़े रहना,

उसके आने की आवाज़ सुनकर,
सबका एक साथ दरवाज़ा खोलने भागना,
घंटों उस पर बैठे रहना,
दूसरों को बैठने न देना,
रात को उस पर तिरपाल डालना...........

कितनी सार संभाल,
जब वो नया नया आया था,
बड़ा खास था हमारे लिए,
न जाने कब क्यों,
पीछे गली में रखा गया,
अलग थलग बेवजह..........,


आज याद आया वो मुझे,
तो मन भर आया,
कितना अच्छा था वो,
वो मेरे पापा को रोज़ ध्यान से,
घर लेकर आता था,

स्कूटर की घंटी से मुझे,
आज भी वो याद आ जाता है,
मैं सब छोड़कर भागती हूँ,
दरवाज़ा खोलती हूँ,
काश! पुराना स्कूटर वो हमारा,
फिर से पापा को ले आये..................................

अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हूँ,..........

अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हूँ,
ताज़ा ताज़ा सूरज मिलता है,
खिला खिला आसमान,
बेरोक टोक साफ़ सोते हुए रास्ते,
अलसाई अंगडाई लेती पौधों फूलों की पत्तिया,
सुबह होने का उत्सव मनाते पक्षी,
और उनके गीतों को सुन जागती हुई पेड़ों की कतारें,
 इन सबके बीच रोज़ बड़ी शिद्दत से कुछ खोजती हूँ मैं..........

इन सबने मेरे बाबूजी को देखा है,
नीयम से हर सुबह कई सालों तक,
इन सबसे मिलवाना चाहते थे वो मुझे,
पर मैं सोई रही इतने सालों तक,
एक ऐसी नींद जो अक्सर किसी के जाने पे टूटती है,
नींद जो कुछ खो जाने पे टूटती है..........

अब नींदों ने मुझसे आग्रह करना छोड़ दिया है,
उन्होंने जाकर मेरे जीवन को ऐसा मोड़ दिया है,
अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हु,

सुबह सुबह वो मानो मुझसे मिलने आते हैं,
मेरी उंगली पकड़ते हैं मुझे चलना सिखाते हैं,
मेरी हिम्मत बंधाते हैं मुझे "दिनकर" सुनाते हैं,
अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हु,

सूरज के हाथ बाबूजी मुझे आशाएं भेजते हैं,
आसमान के हाथ मेरे लिए सपने,
हवाएं उनका आशीर्वाद लाती  हैं,
धीरे से मेरे सर पे हाथ फेर जाती हैं,
रास्ते उनकी तरह उम्मीद बढ़ाते हैं
चलते रहने का पाठ पढ़ाते हैं..........


अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हु,
और चाहकर भी वो सारी सुबहें भूल नहीं पाती हूँ,
जब नींदों में बाबूजी की आवाज सुनती थी,
आँखें मिचमिचा कर करवट बदल कर फिर सो जाती थी,
कल से कल से करके टाल जाती थी,
वो कल जो कभी आया ही नहीं,
वो कल जो अब कभी आ नहीं सकता,

अब रोज सुबह एक झटके से उठती हूँ,
सुबह के पहर में जो उनका आभास है, खोने से डरती हु,
इस तरह से अपने बाबूजी को मिल के आती हूँ,
और इसीलिए ............
अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हूँ............... 

अभिव्यक्तियाँ


मेरे मन की तेरे मन में,
तेरे मन की मेरे मन में,
कुछ उलझने ज़हन में,
बिना कहे तू समझ ले
बिना कहे मैं समझ लूँ,
कुछ हो रहें अभिव्यक्तियाँ.................

कुछ रिक्तियां कभी तू भरे,
कुछ रिक्तियां कभी मैं भरूं,
अनासक्तियों के वक़्त में,
कुछ हो रहें अभिव्यक्तियाँ...............

तेरे मौन को मैं तोड़ दूँ,
मेरे मौन को तू तोड़ दे,
फिर मौन साधें साथ में,
बने मौन भी अभिव्यक्तियाँ.....

तेरे दर्द में मैं रो पडूं,
मेरे दर्द में तू रो सके,
कभी भीग के पलकें बने,
तेरी मेरी अभिव्यक्तियाँ.......


तेरे हाथ में मैं हाथ धर,
हथेलियों में मन की बात धर,
कोई वक़्त हो जिसे थाम लूँ,
और थाम लूँ अभिव्यक्तियाँ..............

Thursday, 17 July 2014

बाबा.....

वो उंचाइयां जो पिरो लीं थी अपनी बातों में तुमने,
वो गहराइयाँ जो थमाँ दी थी मेरे हाथों में तुमने,
वो वक़्त जो बेवक्त ख़त्म हो गया,
सपने सा जीवन, जो अब सपना हो गया,

मैं मुन्तजिर हूँ, खड़ी हूँ द्वार पे उसी,
आना था तुम्हे तुम्हारी देह ही पहुंची,
जो तुम थे बाबा तो तुमसे रंग उत्सव था,
माँ का अपनी देह से एक संग शाश्वत था,

तुम देह लेकर क्या गए वो देह शेष है,
जीने में है न मरने में, जैसे एक अवशेष है,
जोड़ा है सबका संबल फिर भी टूट कर उसने,
जीवन मरण की वेदना से छूट कर उसने,

इस उम्मीद में हर रात देर तक मैं सोती हूँ,
सपने में तुम्हे गले लग के जी भर के रोती हूँ,
बाबा! कहाँ चले गए कब आओगे?
बाबा! जहाँ हो वहां हमें कब बुलाओगे?

ताम्बे का एक लोटा



ताम्बे का एक लोटा,
बरसों भरा मैंने,
उनके आने से पहले उनके सिरहाने रखा,
यह एक काम मेरे हिस्से आया था,


यह एक काम मुझे बहुत अच्छा लगता था,
रोज़ मांज कर भर कर रख दिया करती थी,
उस दिन भी तो रखा था...........................

उस लोटे की भी एक तस्वीर बन गयी है मन में,
वो लोटा भी मानो वहीँ सिरहाने रखा,
अब तक इंतज़ार कर रहा है बाबूजी के आने का..........................

अखबार की कतरनें



पुरानी किताबों डायरीयों में,
मिल जाती हैं अब भी इक्की दुक्की,
दिलाती है याद सुबह की चाय की,
कोई सीख, कोई किस्सा, कोई नसीहत,
सिमट आती है उस सिमटी हुई
मुड़ी, तुड़ी, बरसों पन्नों के बीच दबी हुई,
अखबार की कतरनों में...............

चाय पीते हुए, अखबार पढ़ते हुए,
कभी मुझे कभी भैया को बुलाकर,
थमा देते थे हाथों में पिताजी
अखबार की कतरन.............

कागज़ का वो टुकड़ा,
जीवन का सार होता था,
हम पढ़ते थे उन्हें,
संभल कर रख लेते थे,
अब जब निकल आती हैं,
कभी किसी किताब से अचानक,
तो कागज़ की कतरने भी,
उनकी मौजूदगी, उनका आभास बन जाती हैं...........................

दृश्य

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