
मेहंदी के मौसमों में,
त्यौहारों के दिनों में,
घेवर की खुशबुओं में,
सावन के लहरियों में,
इन्द्रधनुष के रंगों में,
और पीहर के सब प्रसंगों में,
अब कुछ कमी सी है.......
बाबा! तुम्हारे बिना,
दुनिया चल भी रही है...
फिर भी थमी सी है ............
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माँ को नहीं आता था मेहंदी मांडना,
वो हथेली में मेहंदी रख के कर लेती थी मुट्ठियाँ बंद,
मेरी तीज, मेरे त्यौहार,
सब माँ के हाथों में रच जाते थे इस तरह ...........
शगुन का यह खा ले,
शगुन का यह पहन ले,
माँ करा लेती थीं, न जाने कितने शगुन,
पीछे दौड़ भाग के.......
रचा देती थीं मेरे भी हाथों में मेहंदी,
चुपके से आधी रात को.......,
माँ,
मैंने नहीं सीखा तुम्हारे बिना, त्यौहार मनाना, ......
शगुन करना, मीठा बनाना, मेहंदी लगाना,
तुम डाँटोगी फिर भी.....
अब हर तीज, हर त्यौहार,
मैं जी रही हूँ तुम्हारा वैधव्य तुम्हारे साथ ................
(चित्र गूगल से साभार )


