कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं,
जो मिलते हैं वहीँ,
जहां छोड़कर हम उन्हें,
आगे निकल जाते हैं ...........
वो रोकते नहीं,
पीछे से आवाज़ देकर अपशकुन नहीं करते,
बाधा भी नहीं बनते राह की,
बस इंतज़ार करते हैं,
हमारे लौटने का,
हमारे लौटने तक........
वो कुछ रिश्ते,
दूरी के परे,
समय के परे,
शब्दों के परे,
तर्कों के भी परे.....
वो कुछ माँगते नहीं,
कुछ चाहते नहीं
बस सहेज के रखना होता है उन्हें,
जैसे उम्र भर माँ सहेजती है बच्चों की छोटी छोटी चीज़ें....
थोड़ी क़द्र करनी होती है,
और वो मिलते हैं वहीँ हर बार,
जहां छोड़कर हम उन्हें, आगे निकल आये थे...............
जो मिलते हैं वहीँ,
जहां छोड़कर हम उन्हें,
आगे निकल जाते हैं ...........
वो रोकते नहीं,
पीछे से आवाज़ देकर अपशकुन नहीं करते,
बाधा भी नहीं बनते राह की,
बस इंतज़ार करते हैं,
हमारे लौटने का,
हमारे लौटने तक........
वो कुछ रिश्ते,
दूरी के परे,
समय के परे,
शब्दों के परे,
तर्कों के भी परे.....
वो कुछ माँगते नहीं,
कुछ चाहते नहीं
बस सहेज के रखना होता है उन्हें,
जैसे उम्र भर माँ सहेजती है बच्चों की छोटी छोटी चीज़ें....
थोड़ी क़द्र करनी होती है,
और वो मिलते हैं वहीँ हर बार,
जहां छोड़कर हम उन्हें, आगे निकल आये थे...............
