Tuesday, 2 December 2014

संस्मरण 1

हर घटना एक सवाल छोड़ जाती है, विवाह तो फिर जीवन की वो घटना है जहाँ से सवाल शुरू होते हैं.... कभी ख़त्म न होने के लिए.....यह सवाल अच्छे होते हैं, अच्छी खासी रूटीन ज़िन्दगी में खलल पैदा कर देते हैं, सोचने पर मजबूर किये रखते हैं.... पूरियां बनाते हुए, बच्चों को नहलाते हुए, साहब का नाश्ता लगाते हुए, अलमारी जचाते  हुए, ..... कभी कभी मैं घर के सारे परदे हटा देती हूँ, खिड़कियाँ खोल देती हूँ,,,, मानो हवा के साथ कहीं मेरे सवालों के उत्तर घर में आने वाले हों और मुझे कुछ सुकून मिले.... यह जानते हुए की उत्तर सिर्फ तब मिलेंगे जब मैं आशंकाओं और कमज़ोरियों के परदे हटा लूंगी और खोल दूँगी खिड़कियाँ कुछ कंफेशंस को बाहर जाने दूँगी ..... बता दूंगी  सब को की ना जाने किस की नज़र में क्या बनी मैं ..... पर उस क्रम में खुद की नज़र में कितना और कितनी बार गिरी मैं............. मैंने पढ़ा कुछ और, सीखा कुछ और फिर किया बिलकुल उलट......... करने के वक़्त ना दिल साथ देता था और ना आत्मा फिर भी करती रही वो सब कुछ जो नहीं करना चाहती थी......विवाह की शुरू से लेकर आखिर तक किसी रस्म में मैं शामिल नहीं रही पर मैं यह कैसे कह दूँ की एल्बम में जो तस्वीर है वो मेरी नहीं है.... की मैंने ही एक दिन पत्रकारिता का अपना करियर शुरू करने से पहले ख़त्म कर दिया... की मैंने मैदान में पहुँचने से पहले ही हार मान ली और सोच लिया की अगर विवाह ही हर यात्रा का अंत है तो फिर यात्रा शुरू ही विवाह से की जाये... की मैं कभी इस सोच के साथ घर से निकली ही नहीं की कोई मुझे पसंद आएगा और मैं उससे शादी कर लुंगी .... और इसी कारण अरेंज्ड मैरिज के अलावा मैंने कभी अपने नज़दीक कोई विकल्प ही नहीं रखा....... और अरेंज्ड मैरिज में तो मेल और अनमेल जैसा कुछ सोच ही नहीं सकते .... उसमे तो खुद को पूरी तरह त्याग देना होता है.... और इंतज़ार करना होता है कुछ भी मेल का मिल पाने का...........

विवाह मेल का हो या अनमेल का यह हमारे यहांँ प्रश्न ही नहीं. प्रश्न बस विवाह करने का होता है. मेरा अपना विवाह ऐसा था मानो किसी के पूछने से पहले ही उत्तर दे दिया जाये अर्थात किसी को जल्दी नहीं थी फिर भी जल्दी हो गया. सबने कहा जो भी करो शादी के बाद करना तो हमने कहा फिर शादी कर दो. अब एक पत्रकार और लेखक बनने की इच्छा रखने वाली लड़की, सोचने और समझने वाली लड़की, बोलने और लिखने वाली लड़की, पापा की लाड़ली लड़की..... अपने समाज को बीबीसी और डिस्कवरी के कैमरों के पीछे की सोच से देखने वाली लड़की ........अचानक कैमरों के सामने घाघरा ओढ़नी और घूंघटा डाल कर बिठा दी जाये तो वो कुछ देर तो इस बात का आनंद उठा सकती है की वो अपने ही किसी किरदार को जी रही है, उसे समझने की कोशिश कर रही है..... लेकिन अगर उसे पता चले की यह किरदार नहीं है पूरी ज़िन्दगी है तो फिर........  यहां बीवी के दिमाग में सो सो घंटे बज रहे हों, वो अनारकली का वो दर्द महसूस कर रही हो जब उसको चुनवाया जा रहा था और आँखों के आगे आखिरी ईंट रखी जानी थी..... और उधर पति महाशय कह रहे हों ...... सभी के साथ ऐसा ही तो होता है,.थोड़े दिनों में आदत पड़ जाएगी........... अब मैं उन्हें उस वक़्त यह कैसे समझती की आदतें तब पड़ती हैं जब हम खुद वो आदतें डालना चाहें ........  मुझे उन सालों में अमृता प्रीतम की वो बात बहुत याद आई की सदियाँ घरों के बाहर से होकर गुज़र जाती हैं, घरों में प्रवेश नहीं करतीं..... घर स्त्रियों के लिए वैसे ही रह जाते हैं - अपरिवर्तनीय.

दोष किसका जाने, और कोई क्यों माने खुद को दोषी, मैं क्यों शर्मिंदा रहूँ की मैं अलग सोचती हूँ, वो क्यों शर्मिंदा हों की उन्होंने दुनिया को बदलने का सपना नहीं देखा..... मैं कैसे हिम्मत दिखाऊं उनसे अलग होने की, वो क्यों मुझे जाने दें जबकि उनको तो कोई परेशानी ही नहीं. मैं क्या सजा दूँ उनको उन अपराधों की जिनकी वो सिर्फ कड़ी हैं.. वो मुझे कैसे दोष दें जबकि वो देख रहे हों रोज़ बाहर अपने साथ काम करने वाली पढ़ने लिखने वाली लड़कियों को  और जानती हों बाहर की दुनिया बहुत तेज़ी से बदल चुकी है.........उनके पास जवाब नहीं मेरे प्रश्नों के ........ मेरी परेशानी यह की उनके पास तो खुद के प्रश्न ही नहीं..... जवाब गए भाड़ में......  

एक मस्त मौला दिल्ली का लड़का, बुलेट राजा की तरह तेज़ रफ़्तार में सड़कें नापता और खुश रहता ....... जयपुर की एक साधारण सी लड़की ......... एक को सोचने से एलर्जी, एक को सोचते रहने की बीमारी.......... की गलती से कुछ पूछ लूँ उनसे तो सर पकड़ कर बैठ जाएँ और थोड़ी देर में कहें --- चल इंडिया गेट से आइस क्रीम खाकर आते हैं........... बरसों मुझे सारे जवाब इंडिया गेट पर आइस क्रीम के रूप में ही मिले .... वहां हाथों में हाथ डाल कर घुमते हुए आइसक्रीम खाते हुए मैं कभी कभी खुद भी भूल जाती थी अपने सवाल...... और लौट आती थी घर ....... जहाँ अमृता प्रीतम के कहे अनुसार सदियों ने प्रवेश नहीं किया था सदियों से....... जहां आपका पुरुष किसी से प्रति प्रश्न नहीं करता आपके साथ किये जा रहे व्यवहार के बाबत...... दरअसल जहाँ कोई अपने दिमाग पे ज़ोर देकर कुछ नया नहीं सोचना चाहता...... जहाँ जीने की एक सदियों पुरानी रेसिपी है और आपको वही खानी है चाहे रोकर चाहे ख़ुशी से.......... जीने की इस रेसीपी में बच्चे भी उतनी ही अनिवार्यता के साथ पड़ते हैं जितनी अनिवार्यता के साथ आप खुद उसमे मौजूद हैं...........

मेल अनमेल की बातें मूल होकर भी गौण हो जाती हैं कुछ सालों में. तेल लून लकड़ी में पुरुष और बच्चों में स्त्री भूल जाते हैं अपने बीच के अंतर. बसे बसाये घर का ज़ायका फिर कोई नहीं बिगाड़ना चाहता.
विवाह जीवन का वो विषय भी है जिस पर कोई कितनी भी बातें कर ले, और जिसे चाहे कोई कितना भी समझने की कोशिश कर ले पर कभी किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते.... और यह जो निष्कर्ष से पहले का जीवन है यही वैवाहिक जीवन होता है....... दो अलग अलग लोग भी कभी कभी अच्छा घर बसा लेते हैं........ साल दर साल इतना कुछ साझा हो जाता है की उसको अलग करना मुश्किल हो जाता है......... दो बिलकुल विपरीत व्यक्तिओं का आपसी संघर्ष शांत हो जाता है..... वो दोनों एक दुसरे को अपनी ज़िन्दगी चाहे अनचाहे शामिल कर ही लेते हैं, और फिर एक वक़्त ऐसा भी आता है जब सारे अंतरों के बीच मन भी मिल जाते हैं...... साथ बिताये सुख और दुःख के क्षण मज़बूत दीवारों से मेहफ़ूज़ रखते हैं बेमेल विवाह को   ....... थाम ही लेते हैं हाथ दो लोग ..... की विचारों की, प्रकृति की भिन्नता भी एक समय के बाद  नहीं आ पाती साथ सफर तय करने की उनकी साझा स्वीकृति के बीच.  

चंचल शोख लड़का शांत होने लगता है और धीर गंभीर लड़की चतुर और चपल.... कुछ तुम बदलो कुछ हम की तर्ज़ पर ठुमकते हैं दोनों.... कुछ सुर में कुछ बेसुरा, पर गीत बन जाता है वैवाहिक जीवन. उस गीत में कभी कोई अन्तरा मैं जोड़ देती हूँ कभी वो.... कभी बच्चे. सुर हो ताल हो ज़िन्दगी की चाल ढाल
हो सब बदल जाते हैं... नयी स्थितियां बन जाती हैं, कई संघर्ष ख़त्म हो जाते हैं उनकी जगह नए संघर्ष पैदा हो जाते हैं...... रीती रिवाज़ रहन सहन समय के साथ कुछ तो बदल जाते हैं कुछ को हम बदल देते हैं...... और इन सारे बदलते पलों के बीच दो लोग .... दो बिलकुल अलग अलग लोग .......... बिना किसी एहसास के की कितनी दूर निकल आये हैं और कितनी दूर जाना है..... साथ साथ चलते रहते हैं....

दृश्य

जोड़ी अच्छी है  लड़के ने पढ़ी दुर्गासप्तशती  पत्नी मनोरमाम देही, मनोवृतानुसारिणिम  लड़की ने पढ़ा संविधान  अनुच्छेद 14, 19 और 21  ...