Saturday, 6 December 2014

मासूम सी एक कोशिश.......



एक मासूम सी कोशिश है वो,
कुछ दिनों से हाथ पकड़ कर कहीं खींच रही है,
कुछ दिखाना चाहती है,
कुछ बताना चाहती है,
कुछ लिखवा देना चाहती है मुझसे........

एक मासूम सी कोशिश है वो,
मेरे दुपट्टे को नन्ही उँगलियों में घुमाकर,
अपनी बातों से मेरे मन को लुभाकर,
मनवा रही है अपनी सारी जिद्दियाँ,
करवा रही है मुझसे सबकुछ जो वो चाहती है.......

एक मासूम सी कोशिश है वो,
मेरी किताबों में नए रंग भर रही है,
खूम मनमानियां कर रही है,
कभी कभी ज़रा ज़रा डर रही है
पर रुकने का कोई नाम नहीं,
न थकती है, न मुझे थकने देती है....

एक मासूम सी कोशिश है वो,
देर तक सोती नहीं, सुबह जल्दी उठ जाती है,
अपनी अठखेलियों से हर वक़्त गुदगुदाती है,
काम के वक़्त चुपके से आती है, छेड़ती है, भाग जाती है,
पर जो एक पल भी ओझल हो जाये तो बेचैन हो जाती हूँ मैं.......

एक मासूम सी कोशिश है वो ,
मैं हूँ इस वजह से की वो मेरे साथ है,
उसके होने से ही जीवन में जीवन सी बात है,
वो न हो तो जीने को बस दिन है रात है,
मेरी एक मासूम सी कोशिश है वो........................

Wednesday, 3 December 2014

एक दिन की नायिका


                                                      (चित्र गूगल से साभार )




वो गांव के बहार की तरफ टीलों से होते हुए भैरों जी के स्थान पर धोक देने और नए जीवन के लिए उनका आशीर्वाद लेने अपने बींद के पीछे पीछे आगे बढ़ रही थी और साथ ही पूरे दिल से अपने मन के ईश्वर को बार बार धन्यवाद भी दे रही थी .. उस ख़ुशी के लिए, उस अनुभव के लिए..... लाल प्योर जॉर्जट पर गोटा तारी के काम वाला उसका बेस (दुल्हन की पोशाक), ठेठ राजस्थानी स्टाइल में बने आड़, बाजूबंद, हथफूल, राखड़ी, शीशफूल, पाजेब अंगूठियां, लाल गोटे जड़ी जूतियां, और नाक के कांटे में जड़ा हीरा...... उस घडी वो  नायिका थी वहां की,  उस गावं की, उन पगडंडियों की, और उन रेत के  टीलों की भी........ अपने बींद के पीछे पीछे वो  बिलकुल वैसे चल रही थी जैसे गावं में लाल जोड़े में,घूंघट में किसी नै नवीली बींदणी को चलना चाहिए था..... वो बेहद सहजता से शर्म को ओढ़ कर धीमे धीमे कदम भर रही थी........ लहंगे की लावन में कुछ कांटे लग गए थे जो कभी कभी पैरों को छू जाते थे पर उनसे कोई दर्द हुआ हो ऐसा उसे  याद नहीं.... ब्याह के चार दिन पहले छीदाये नाक में कोई टीस उठी हो यह भी उसे पता नहीं....... वो तो खोई थी.... चल भी रही थी तो जैसे सपनो में हो, सपने आनेवाले दिनों के, सपने आने वाली रातों के, ......... लम्बे चौड़े अपने मुटियार को एक नज़र उठा के देख लेती फिर डर जाती की कहीं किसी ने देख तो नहीं लिया.... कितने लोग थे वहां.... कितनो की नज़रों के नीचे थी नै बींदणी अपने बींद को देखने की बेशर्मी कैसे करती उनके बीच .... फिर से वो अपना ध्यान उस दिन को पूरा पूरा जीने पर ले आई...... ढोली ढोल बजा रहा था और बीरम कभी गोरबन्ध कभी चिरमी और कभी मूमल गा रहा था.... और वो पग भर रही थी टीलों पर बिलकुल नखराली मूमल की तरह ....... वो नायिका थी उस दिन की.... आगे आगे उसका बींद.... पीछे पीछे सपनो से भरी सपनों सी सुन्दर सजी धजी बींदणी....

जैसे जैसे वो आगे बढ़ रहे थे, और लोग साथ हो लेते थे... गावं में ब्याह एक बहुत चहल पहल की घटना होती है.... बुलाये बिन बुलाये सब शामिल होते हैं ..... नै बींदणी होती है उन सब की बातों का केंद्र........ घर परिवार की औरतें तो थी ही ........ जेठानियों ने नई बींदणी को दोनों और से संभाल रखा था... कहीं नए नए कपड़ों और घूंघट में उलझ कर बींदणी गिर जाए..... सर्दियों के दिनों में भी जो टीलों पर गर्मी होती है.... उसमे नाजुक सी बींदणी थक जाये ........छोटी छोटी और जवान होती सब छोरियाँ नयी बींदणी की हर एक चीज़ को बड़े ध्यान से देख रही थीं, और मन ही मन तय कर रहीं थीं की उन्हें अपने ब्याह में क्या क्या बनवाना है.....  लुगाइयाँ सब टाबर टोलियों को लेकर गप्पे मारती, हंसी करती, नए बींद बींदणी को छेड़तीं, साथ साथ चल रहीं थीं  ........ कोई कोई तो ऐसी चुटकी ले लेती की उसका बींद शर्मा के आगे बढ़ जाता और वो अपने लाल ओढने सी लाल हो जाती......और दोनों को शर्माता देखकर सब कहीं कहीं अपनी शादी का दिन याद कर खुद भी शर्माने लगतीं .......... पर उस घडी तो उसकी शर्म भी उन सब से कितनी अलग थी ..... नयी बींदणी थी वो,  उस दिन की नायिका थी.....

माताजी के स्थान पर धोक देने के बाद परिक्रमा के लिए जैसे ही मढ़ के पीछे पहुंची ........ बींद ने धीरे से पीछे मुड़ कर पूछ लिया था .... तुम ठीक तो हो ....... और वो लजाई सी जवाब देना भी भूल गई थी ...... और तब तो बिलकुल सकुचा गई जब जिठानियों ने उस पर भी चुटकी ले ली....... बना  बड़ी देर लगाई आपने परिक्रमा में .... आज मिल जायेगा भाई आपको अपनी बींदणी से बातें करने का मौका ..... दिन ढलने तक थोड़ा इंतज़ार और कर लो सा.......


दिन ढलने का इंतज़ार? नहीं वो नहीं चाहती थी की दिन ढले, नहीं चाहती थी की ढोली का ढोल रुके कभी, बीरम का गीत थमे कभी, ....... पर दिन को और जीवन को दोनों को ढलने से कब कौन रोक पाया है.......... बींदणी बनी आज जो धीमे धीमे पग धर मिटटी के धोरों को लावन में समेटती घर लौट रही है,  देवी देवताओं को धोक कर अपने नए जीवन की शुरुआत कर रही है,  यही धोरों की नायिका न जाने कब माई, काकी, भाबिसा, और फिर भाबू बन जाएगी.  जब और बूढी होगी तो बूजीसा बन जाएगी........ सुसरो जी की जिस चौखट पर और अपने बींद के जिस गॉव में वो नई बींदणी बनी छनकते पग भर रही है, वहीँ किसी दिन भाबूसा बन टाबरियों को डराने के काम आएगी, आते जाते लोग वहीँ उन्ही धोरों में कहीं डोकरी राम राम कहकर पास से निकल जायेंगे................

किसी ऊँचे से टीले से उसने  एक झलक जी भर के अपना ससुराल देखा फिर आँखें बंद कर उन धोरों को, सारंगी की आवाज़ को, ढोल की थाप को, बीरम की राग को, गोटे तारी की किनरियों को, उन जवान छोरियों को जिन के जीवन में बींदणी बनना सबसे बड़ा सपना था, उन नाक टपकते टाबरियों को, अपने साथ चल रही देवरानीयो जिठानियों को, केसरिया साफा पहने आगे आगे चलते अपने बींद को, और अपने जीवन में सौभाग्य से आये उस दिन को..... हमेशा हमेशा के लिए अपने मन में संजो लिया......... वो नायिका थी उन सबकी उस एक दिन......................

Tuesday, 2 December 2014

संस्मरण 1

हर घटना एक सवाल छोड़ जाती है, विवाह तो फिर जीवन की वो घटना है जहाँ से सवाल शुरू होते हैं.... कभी ख़त्म न होने के लिए.....यह सवाल अच्छे होते हैं, अच्छी खासी रूटीन ज़िन्दगी में खलल पैदा कर देते हैं, सोचने पर मजबूर किये रखते हैं.... पूरियां बनाते हुए, बच्चों को नहलाते हुए, साहब का नाश्ता लगाते हुए, अलमारी जचाते  हुए, ..... कभी कभी मैं घर के सारे परदे हटा देती हूँ, खिड़कियाँ खोल देती हूँ,,,, मानो हवा के साथ कहीं मेरे सवालों के उत्तर घर में आने वाले हों और मुझे कुछ सुकून मिले.... यह जानते हुए की उत्तर सिर्फ तब मिलेंगे जब मैं आशंकाओं और कमज़ोरियों के परदे हटा लूंगी और खोल दूँगी खिड़कियाँ कुछ कंफेशंस को बाहर जाने दूँगी ..... बता दूंगी  सब को की ना जाने किस की नज़र में क्या बनी मैं ..... पर उस क्रम में खुद की नज़र में कितना और कितनी बार गिरी मैं............. मैंने पढ़ा कुछ और, सीखा कुछ और फिर किया बिलकुल उलट......... करने के वक़्त ना दिल साथ देता था और ना आत्मा फिर भी करती रही वो सब कुछ जो नहीं करना चाहती थी......विवाह की शुरू से लेकर आखिर तक किसी रस्म में मैं शामिल नहीं रही पर मैं यह कैसे कह दूँ की एल्बम में जो तस्वीर है वो मेरी नहीं है.... की मैंने ही एक दिन पत्रकारिता का अपना करियर शुरू करने से पहले ख़त्म कर दिया... की मैंने मैदान में पहुँचने से पहले ही हार मान ली और सोच लिया की अगर विवाह ही हर यात्रा का अंत है तो फिर यात्रा शुरू ही विवाह से की जाये... की मैं कभी इस सोच के साथ घर से निकली ही नहीं की कोई मुझे पसंद आएगा और मैं उससे शादी कर लुंगी .... और इसी कारण अरेंज्ड मैरिज के अलावा मैंने कभी अपने नज़दीक कोई विकल्प ही नहीं रखा....... और अरेंज्ड मैरिज में तो मेल और अनमेल जैसा कुछ सोच ही नहीं सकते .... उसमे तो खुद को पूरी तरह त्याग देना होता है.... और इंतज़ार करना होता है कुछ भी मेल का मिल पाने का...........

विवाह मेल का हो या अनमेल का यह हमारे यहांँ प्रश्न ही नहीं. प्रश्न बस विवाह करने का होता है. मेरा अपना विवाह ऐसा था मानो किसी के पूछने से पहले ही उत्तर दे दिया जाये अर्थात किसी को जल्दी नहीं थी फिर भी जल्दी हो गया. सबने कहा जो भी करो शादी के बाद करना तो हमने कहा फिर शादी कर दो. अब एक पत्रकार और लेखक बनने की इच्छा रखने वाली लड़की, सोचने और समझने वाली लड़की, बोलने और लिखने वाली लड़की, पापा की लाड़ली लड़की..... अपने समाज को बीबीसी और डिस्कवरी के कैमरों के पीछे की सोच से देखने वाली लड़की ........अचानक कैमरों के सामने घाघरा ओढ़नी और घूंघटा डाल कर बिठा दी जाये तो वो कुछ देर तो इस बात का आनंद उठा सकती है की वो अपने ही किसी किरदार को जी रही है, उसे समझने की कोशिश कर रही है..... लेकिन अगर उसे पता चले की यह किरदार नहीं है पूरी ज़िन्दगी है तो फिर........  यहां बीवी के दिमाग में सो सो घंटे बज रहे हों, वो अनारकली का वो दर्द महसूस कर रही हो जब उसको चुनवाया जा रहा था और आँखों के आगे आखिरी ईंट रखी जानी थी..... और उधर पति महाशय कह रहे हों ...... सभी के साथ ऐसा ही तो होता है,.थोड़े दिनों में आदत पड़ जाएगी........... अब मैं उन्हें उस वक़्त यह कैसे समझती की आदतें तब पड़ती हैं जब हम खुद वो आदतें डालना चाहें ........  मुझे उन सालों में अमृता प्रीतम की वो बात बहुत याद आई की सदियाँ घरों के बाहर से होकर गुज़र जाती हैं, घरों में प्रवेश नहीं करतीं..... घर स्त्रियों के लिए वैसे ही रह जाते हैं - अपरिवर्तनीय.

दोष किसका जाने, और कोई क्यों माने खुद को दोषी, मैं क्यों शर्मिंदा रहूँ की मैं अलग सोचती हूँ, वो क्यों शर्मिंदा हों की उन्होंने दुनिया को बदलने का सपना नहीं देखा..... मैं कैसे हिम्मत दिखाऊं उनसे अलग होने की, वो क्यों मुझे जाने दें जबकि उनको तो कोई परेशानी ही नहीं. मैं क्या सजा दूँ उनको उन अपराधों की जिनकी वो सिर्फ कड़ी हैं.. वो मुझे कैसे दोष दें जबकि वो देख रहे हों रोज़ बाहर अपने साथ काम करने वाली पढ़ने लिखने वाली लड़कियों को  और जानती हों बाहर की दुनिया बहुत तेज़ी से बदल चुकी है.........उनके पास जवाब नहीं मेरे प्रश्नों के ........ मेरी परेशानी यह की उनके पास तो खुद के प्रश्न ही नहीं..... जवाब गए भाड़ में......  

एक मस्त मौला दिल्ली का लड़का, बुलेट राजा की तरह तेज़ रफ़्तार में सड़कें नापता और खुश रहता ....... जयपुर की एक साधारण सी लड़की ......... एक को सोचने से एलर्जी, एक को सोचते रहने की बीमारी.......... की गलती से कुछ पूछ लूँ उनसे तो सर पकड़ कर बैठ जाएँ और थोड़ी देर में कहें --- चल इंडिया गेट से आइस क्रीम खाकर आते हैं........... बरसों मुझे सारे जवाब इंडिया गेट पर आइस क्रीम के रूप में ही मिले .... वहां हाथों में हाथ डाल कर घुमते हुए आइसक्रीम खाते हुए मैं कभी कभी खुद भी भूल जाती थी अपने सवाल...... और लौट आती थी घर ....... जहाँ अमृता प्रीतम के कहे अनुसार सदियों ने प्रवेश नहीं किया था सदियों से....... जहां आपका पुरुष किसी से प्रति प्रश्न नहीं करता आपके साथ किये जा रहे व्यवहार के बाबत...... दरअसल जहाँ कोई अपने दिमाग पे ज़ोर देकर कुछ नया नहीं सोचना चाहता...... जहाँ जीने की एक सदियों पुरानी रेसिपी है और आपको वही खानी है चाहे रोकर चाहे ख़ुशी से.......... जीने की इस रेसीपी में बच्चे भी उतनी ही अनिवार्यता के साथ पड़ते हैं जितनी अनिवार्यता के साथ आप खुद उसमे मौजूद हैं...........

मेल अनमेल की बातें मूल होकर भी गौण हो जाती हैं कुछ सालों में. तेल लून लकड़ी में पुरुष और बच्चों में स्त्री भूल जाते हैं अपने बीच के अंतर. बसे बसाये घर का ज़ायका फिर कोई नहीं बिगाड़ना चाहता.
विवाह जीवन का वो विषय भी है जिस पर कोई कितनी भी बातें कर ले, और जिसे चाहे कोई कितना भी समझने की कोशिश कर ले पर कभी किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते.... और यह जो निष्कर्ष से पहले का जीवन है यही वैवाहिक जीवन होता है....... दो अलग अलग लोग भी कभी कभी अच्छा घर बसा लेते हैं........ साल दर साल इतना कुछ साझा हो जाता है की उसको अलग करना मुश्किल हो जाता है......... दो बिलकुल विपरीत व्यक्तिओं का आपसी संघर्ष शांत हो जाता है..... वो दोनों एक दुसरे को अपनी ज़िन्दगी चाहे अनचाहे शामिल कर ही लेते हैं, और फिर एक वक़्त ऐसा भी आता है जब सारे अंतरों के बीच मन भी मिल जाते हैं...... साथ बिताये सुख और दुःख के क्षण मज़बूत दीवारों से मेहफ़ूज़ रखते हैं बेमेल विवाह को   ....... थाम ही लेते हैं हाथ दो लोग ..... की विचारों की, प्रकृति की भिन्नता भी एक समय के बाद  नहीं आ पाती साथ सफर तय करने की उनकी साझा स्वीकृति के बीच.  

चंचल शोख लड़का शांत होने लगता है और धीर गंभीर लड़की चतुर और चपल.... कुछ तुम बदलो कुछ हम की तर्ज़ पर ठुमकते हैं दोनों.... कुछ सुर में कुछ बेसुरा, पर गीत बन जाता है वैवाहिक जीवन. उस गीत में कभी कोई अन्तरा मैं जोड़ देती हूँ कभी वो.... कभी बच्चे. सुर हो ताल हो ज़िन्दगी की चाल ढाल
हो सब बदल जाते हैं... नयी स्थितियां बन जाती हैं, कई संघर्ष ख़त्म हो जाते हैं उनकी जगह नए संघर्ष पैदा हो जाते हैं...... रीती रिवाज़ रहन सहन समय के साथ कुछ तो बदल जाते हैं कुछ को हम बदल देते हैं...... और इन सारे बदलते पलों के बीच दो लोग .... दो बिलकुल अलग अलग लोग .......... बिना किसी एहसास के की कितनी दूर निकल आये हैं और कितनी दूर जाना है..... साथ साथ चलते रहते हैं....

Monday, 1 December 2014

Dear Home-Maker,



Home-makers are often taken for granted, by society as well as their own selves. Here is why you must take care of yourself, dear home-maker!
For a child coming with tears in his eyes, and for a man who is almost depressed with the ups and downs of his career, for a house which strives  to be organized, and for a kitchen waiting for you to go and enliven it – you have to be a strong person, and not just a home-maker. Gone are the days when you had to be the one who sacrificed everything for others. Today, to cope with the expectations of others, you have to first understand your own needs and importance in other’s lives.
You have to really understand that the whole journey of happiness, growth, improvement, learning, and gaining strength has to be initiated by you, and with you. To be a confident, successful, and good mother you first have to learn to nurture yourself.  To be a support to your partner you have to be content yourself. To make a cheerful house, you have to be happy first.  To prepare healthy food, you have to be physically sound first. It’s you where the line starts.
We women are taught not to keep ourselves as a priority. Our needs, happiness, and well-being often take a back seat.
In other words, to be the centre of the lives of others, you have to be the centre of your own life first. We women are taught not to keep ourselves as a priority. Our needs, happiness, and well-being often take a back seat. We are brainwashed and cultured for centuries already, so for many coming centuries we will have to keep revising and spreading the lessons of self-reliance and self-respect.
There are women who are the ‘achievers’ – they go out, work, attain success, and live a happy and content life.  But a good majority of us still choose to be home-makers  – sometimes as a matter of helplessness, sometimes for kids, sometimes only because our husbands are in transferable jobs. There are many reasons behind the kind of life one is living but there is always this necessity that we be the focus of our lives. We must value our status of a home-maker.
Had it been a little easier to bring up kids, stay at home, take care of everybody in the house, manage the kitchen and a thousand other household affairs together, men would have already chosen to stay at home.
There are a few things which every home-maker should know and understand. Had it been a little easier to bring up kids, stay at home, take care of everybody in the house, manage the kitchen and a thousand other household affairs together, men would have already chosen to stay at home. Had it been easy to be dependent and remain confident at the same time, men would have chosen this too.
Had it been easier to live a totally unacknowledged life at home for years in a monotony, men would have been found at home only. So, the moral of the story is – what we are doing in life takes real courage. Be in admiration of yourself, be your own priority, and most of all, be in love with yourself.

दृश्य

जोड़ी अच्छी है  लड़के ने पढ़ी दुर्गासप्तशती  पत्नी मनोरमाम देही, मनोवृतानुसारिणिम  लड़की ने पढ़ा संविधान  अनुच्छेद 14, 19 और 21  ...