ज़िन्दगी कितनी लम्हा लम्हा जीती हो,
अटकी सी, खोई सी, रुकी रुकी सी,
उलझी सी, सोई सी, झुकी झुकी सी,
पाकर के सबकुछ तुम, रहती रीति हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतनी लम्हा लम्हा जीती हो........
तुम बरसती नहीं क्यों बादल की तरह छा कर,
तुम महकती नहीं क्यों फूलों की खुशबू पाकर,
जाने किसे है पाना जो खोजती रहती हो,
जाने वो क्या है जिसको तुम सोचती रहती हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतनी लम्हा लम्हा जीती हो........
आशा के एक जाने से संसार नहीं रुकता,
विपदाओं के आगे कभी आधार नहीं झुकता,
जुट जाना ही पड़ता है, लड़ जाना ही पड़ता है,
तुम फ़िक्र की लपट में इतना क्यों सुलगती हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतना लम्हा लम्हा जीती हो.......
किसी मौन की घडी में आवाज़ अपनी सुनकर,
किसी रेशमी लड़ी में तुम स्वप्न नया बुनकर,
हो जाओ फिर खड़ी तुम, साहस को फिर सम्भालो,
भूलो नहीं की तुम एक कोशिश की ही परिणीति हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतनी लम्हा लम्हा जीती हो...........
अटकी सी, खोई सी, रुकी रुकी सी,
उलझी सी, सोई सी, झुकी झुकी सी,
पाकर के सबकुछ तुम, रहती रीति हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतनी लम्हा लम्हा जीती हो........
तुम बरसती नहीं क्यों बादल की तरह छा कर,
तुम महकती नहीं क्यों फूलों की खुशबू पाकर,
जाने किसे है पाना जो खोजती रहती हो,
जाने वो क्या है जिसको तुम सोचती रहती हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतनी लम्हा लम्हा जीती हो........
आशा के एक जाने से संसार नहीं रुकता,
विपदाओं के आगे कभी आधार नहीं झुकता,
जुट जाना ही पड़ता है, लड़ जाना ही पड़ता है,
तुम फ़िक्र की लपट में इतना क्यों सुलगती हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतना लम्हा लम्हा जीती हो.......
किसी मौन की घडी में आवाज़ अपनी सुनकर,
किसी रेशमी लड़ी में तुम स्वप्न नया बुनकर,
हो जाओ फिर खड़ी तुम, साहस को फिर सम्भालो,
भूलो नहीं की तुम एक कोशिश की ही परिणीति हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतनी लम्हा लम्हा जीती हो...........