Thursday, 15 May 2014

Zindagi Lamha Lamha.................

ज़िन्दगी कितनी लम्हा लम्हा जीती हो,
अटकी सी, खोई सी, रुकी रुकी सी,
उलझी सी, सोई सी, झुकी झुकी सी,
पाकर के सबकुछ तुम, रहती रीति हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतनी लम्हा लम्हा जीती हो........

तुम बरसती नहीं क्यों बादल की तरह छा कर,
तुम महकती नहीं क्यों फूलों की खुशबू पाकर,
जाने किसे है पाना जो खोजती रहती हो,
जाने वो क्या है जिसको तुम सोचती रहती हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतनी लम्हा लम्हा जीती हो........

आशा के एक जाने से संसार नहीं रुकता,
विपदाओं के आगे कभी आधार नहीं झुकता,
जुट जाना ही पड़ता है, लड़ जाना ही पड़ता है,
तुम फ़िक्र की लपट में इतना क्यों सुलगती हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतना लम्हा लम्हा जीती हो.......

किसी मौन की घडी में आवाज़ अपनी सुनकर,
किसी रेशमी लड़ी में तुम स्वप्न नया बुनकर,
हो जाओ फिर खड़ी तुम, साहस को फिर सम्भालो,
भूलो नहीं की तुम एक कोशिश की ही परिणीति हो,
ज़िन्दगी! क्यों तुम इतनी लम्हा लम्हा जीती हो...........

ये खुद से मिलने का डरा सहमा सिलसिला है....

ये खुद से मिलने का डरा सहमा सिलसिला है,
मैं उसको छुपाऊं कैसे जो मुझमे मेरी साँसों सा घुला है,
न समझेंगे न समझाना चाहेंगे लोग,
वो सच वो विश्वास मेरा मुझमे बड़ी मुश्किल से मिला है.....

अलमारी के सबसे ऊँचे खांचे में,
दीवान की सबसे निचली सतह में,
मैं छुपा देती थी उसको, नज़दीक नहीं आने देती थी,
वो मिलते ही एक मौका, अब झट से आ मिला है,
ये खुद से ही मिलने का डरा सहमा सिलसिला है.........

उसे देखकर भांपकर मेरी आँखों में,
कुछ रिश्तों की नीवें हिल जाती हैं,
मैं झटक कर उसे फिर से रिश्ते संभालती हूँ,
वो पूछता रहता है ये कौनसा सिला है,
ये खुद ही से मिलने का डरा सहमा सिलसिला है..............

मैं मिलती हूँ उससे चोरी से छुप छुपा कर,
बातें भी किया करती हूँ धीरे से फूस फुसा कर,
की वक़्त ये नहीं है तेरे मेरे मिलन का,
वो पूछता रहता है अब देर क्यों भला है,
ये खुद से ही मिलने का डरा सहमा सिलसिला है.........................

ये युद्ध के पहले की तैयारी का क्षण है,
ये विरह नहीं, मिलन की प्रतीक्षा प्रतिक्षण है,
तुझसे मेरा मिलन है जीवन में अविशाम्भावी
मेरे मन की रेत में तू एक फूल सा खिला  है,
ये खुद से मिलने का डरा सहमा सिलसिला है.....................

शब्द बनाकर कागज़ पे बैठा दिया.....

बहुत दिनों बाद वक़्त मिला है मुझसे,
यूँही मिले बगैर गुज़र जाया करता था,
मैं खोजती रहती थी, वो छुपता रहता था,
कभी बच्चों के पीछे, कभी कपड़ों के ढेर में,
कभी कढाई, करचे, झाड़ू.........
कहीं भी जा छुपता था,
पर मैंने ढूंढ ही लिया उसे,
अपनी डायरी में क़ैद कर लिया,
शब्द बनाकर कागज़ पे बैठा दिया.......


दीवार पर रंगीन लकीरों में,
बेतरतीब किताबों खिलोनो में,
ये नहीं खाना, वो नहीं पहनना इन झगड़ों में,
आज नया क्या बनाऊ, क्या खिलाऊं की उलझनों में,
खांसी, जुखाम डाक्टर के चक्करों में,
खूब घुमाया वक़्त ने अपने पीछे,
आज पकड़ ही लिया,
जकड ही लिया अपनी बातों में,
और छुपा लिया शब्दों के भीतर हमेशा के लिए........

जानती हु बड़ा चालाक है फिर से फिसल जायेगा,
निकल भागेगा उड़न छु हो जायेगा,
बच्चों को उठाने में, नहलाने में,
 सुबह के नाश्ते, रात के खाने में,
अ बी सी डी सिखाने में,
शेर कछुए भालू की कहानियाँ सुनाने में,
मैं पीछे पीछे वो आगे आगे,
और एक दिन फिर मिल जायेगा यूँ ही भूले भटके,
मैं फिर पकड़ना चाहूंगी, वो फिर भाग जायेगा,
मैं कुछ देर रुकने को कहूँगी  और वो हमेशा की तरह जल्दी में होगा...


मैं फिर मशगुल हो जाउंगी,
कुछ सालों और खो जाउंगी,
घर गृहस्ती बच्चों में डूबी,
दिन भर काम करुँगी और सो जाउंगी,
किसी दिन वो अचानक फिर आ जायेगा,
वक़्त ही मुझे मुझसे मिलवायेगा,
मैं जानूंगी, पहचानूंगी, समझूँगी खुद को,
वो इससे पहले ही कहीं फिर फुर्र्र हो जायेगा................................

लिखना ही बस आखिरी इलाज है .....




......................................................लिखना चाहकर न लिख पाना....... मानो जीवन जीना नहीं मन ही मन लिखते जाना है..... सब गुज़र रहा है.... और  सब लिखा जा रहा है... कभी कभी खुद को खींच लाती हूँ... खुद के जीवन में....... कभी कभी खुद को दूर ले जाती हूँ... खुद से , जीवन से, ......... जीवन सदैव जीवन से पर...... मैं कभी भी नहीं थी अपने जीवन में...... मैं तो दूर से देख रही थी..........उस लड़की को उसके जीवन को ........ उस जीवन को जिसे वो खुद जी ही नहीं रही थी........ मैं देख रही थी उसे उड़ते, फिर बंधते, धुनते, ............. मैं देख समझ रही थी उसके प्रतिबन्ध................ और प्रतिबंधों के बीच उसके उन्मुक्त मन को, प्रतिबन्ध तो वैसे भी शरीर के होते हैं, और व्यवस्थाएं ये बेहतर जानती हैं..... तभी तो आक्रमण उसके शरीर पे नहीं उसके मन, उसकी आत्मा, उसके विश्वास पर .................... की गर खिड़कियाँ दरवाज़े खुले मिल भी जाएँ तो वो एकबारगी कोशिश न कर सके बाहर झाँकने की............................

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