Thursday, 15 May 2014

ये खुद से मिलने का डरा सहमा सिलसिला है....

ये खुद से मिलने का डरा सहमा सिलसिला है,
मैं उसको छुपाऊं कैसे जो मुझमे मेरी साँसों सा घुला है,
न समझेंगे न समझाना चाहेंगे लोग,
वो सच वो विश्वास मेरा मुझमे बड़ी मुश्किल से मिला है.....

अलमारी के सबसे ऊँचे खांचे में,
दीवान की सबसे निचली सतह में,
मैं छुपा देती थी उसको, नज़दीक नहीं आने देती थी,
वो मिलते ही एक मौका, अब झट से आ मिला है,
ये खुद से ही मिलने का डरा सहमा सिलसिला है.........

उसे देखकर भांपकर मेरी आँखों में,
कुछ रिश्तों की नीवें हिल जाती हैं,
मैं झटक कर उसे फिर से रिश्ते संभालती हूँ,
वो पूछता रहता है ये कौनसा सिला है,
ये खुद ही से मिलने का डरा सहमा सिलसिला है..............

मैं मिलती हूँ उससे चोरी से छुप छुपा कर,
बातें भी किया करती हूँ धीरे से फूस फुसा कर,
की वक़्त ये नहीं है तेरे मेरे मिलन का,
वो पूछता रहता है अब देर क्यों भला है,
ये खुद से ही मिलने का डरा सहमा सिलसिला है.........................

ये युद्ध के पहले की तैयारी का क्षण है,
ये विरह नहीं, मिलन की प्रतीक्षा प्रतिक्षण है,
तुझसे मेरा मिलन है जीवन में अविशाम्भावी
मेरे मन की रेत में तू एक फूल सा खिला  है,
ये खुद से मिलने का डरा सहमा सिलसिला है.....................

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