Thursday, 15 May 2014

शब्द बनाकर कागज़ पे बैठा दिया.....

बहुत दिनों बाद वक़्त मिला है मुझसे,
यूँही मिले बगैर गुज़र जाया करता था,
मैं खोजती रहती थी, वो छुपता रहता था,
कभी बच्चों के पीछे, कभी कपड़ों के ढेर में,
कभी कढाई, करचे, झाड़ू.........
कहीं भी जा छुपता था,
पर मैंने ढूंढ ही लिया उसे,
अपनी डायरी में क़ैद कर लिया,
शब्द बनाकर कागज़ पे बैठा दिया.......


दीवार पर रंगीन लकीरों में,
बेतरतीब किताबों खिलोनो में,
ये नहीं खाना, वो नहीं पहनना इन झगड़ों में,
आज नया क्या बनाऊ, क्या खिलाऊं की उलझनों में,
खांसी, जुखाम डाक्टर के चक्करों में,
खूब घुमाया वक़्त ने अपने पीछे,
आज पकड़ ही लिया,
जकड ही लिया अपनी बातों में,
और छुपा लिया शब्दों के भीतर हमेशा के लिए........

जानती हु बड़ा चालाक है फिर से फिसल जायेगा,
निकल भागेगा उड़न छु हो जायेगा,
बच्चों को उठाने में, नहलाने में,
 सुबह के नाश्ते, रात के खाने में,
अ बी सी डी सिखाने में,
शेर कछुए भालू की कहानियाँ सुनाने में,
मैं पीछे पीछे वो आगे आगे,
और एक दिन फिर मिल जायेगा यूँ ही भूले भटके,
मैं फिर पकड़ना चाहूंगी, वो फिर भाग जायेगा,
मैं कुछ देर रुकने को कहूँगी  और वो हमेशा की तरह जल्दी में होगा...


मैं फिर मशगुल हो जाउंगी,
कुछ सालों और खो जाउंगी,
घर गृहस्ती बच्चों में डूबी,
दिन भर काम करुँगी और सो जाउंगी,
किसी दिन वो अचानक फिर आ जायेगा,
वक़्त ही मुझे मुझसे मिलवायेगा,
मैं जानूंगी, पहचानूंगी, समझूँगी खुद को,
वो इससे पहले ही कहीं फिर फुर्र्र हो जायेगा................................

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