Friday, 13 February 2015

फागण आयो....

                                                                (चित्र गूगल से साभार )


फागण आयो फागणो रंगा दे रसिया म्हारा मन बसिया फागण आयो.........

फागुन में फाग की याद के साथ सबसे ज्यादा याद आती है माँ (दादी माँ) ..... माँ बेचैन रहती थी... खासकर फागुन के मौसम में.... चार चार बेटों के भरे पूरे परिवार में माँ बेचैन रहती थी..... कहीं कोई बाहर जाने को टोक न दे.... मंदिर में फाग के कारण जो भीड़ भड़क्का होने वाला होता उसके कारण कोई घर पर ही बैठे रहने को न कह दे, ... रोज़ अलग अलग कार्यक्रम और उतनी ही अलग अलग झांकियां.... माँ किसी को नाराज़ भी नहीं करना चाहती थी.... पर फाग भी देखने जाना चाहती थी... मुश्किल बस इतनी होती थी की हम सब एक सुर में कह देते थे -- माँ क्या करोगी जाकर....., बेटे आते जाते टोक देते थे... क्या करेगी माँ मंदिर जाकर ... घर बैठ कर ही राम राम कर ले ..... फिर भी माँ हारती नहीं थी.... बेटों के ऑफिस जाने के बाद माँ किसी न किसी बच्चे को साथ लेकर फाग देखने ज़रूर जाती.... थोक के भाव में घर में बच्चे थे...... इसी क्रम में मैं कई बार उनके साथ गोविन्द देव जी गई .... फाग देखा....

फाग का मौसम तो यादों का मौसम होता ही है....... विरह भी इस मौसम में वैसे ही अधिक दुखता है जैसे बारिश के मौसम में टूटी हुई किसी हड्डी में टीस उठती हो...... अब माँ नहीं है, पर फाग अभी भी हो रहा होगा......... लोग गोविन्द पर गुलाल फेंक फेंक कर गा रहे होंगे.... फागण आयो फागणो रंगा दे रसिया म्हारा मन बसिया फागण आयो.........अब तो माँ गोविन्द के पास ही है, अब कोई नहीं टोकता होगा उसे, माँ खेलती होगी खुलकर फाग अपने गोविन्द के साथ. .... माँ चार चार बेटों की माँ, पिताजी के जाने के बाद, घर के बाहर एक तख्ते पर बैठी रहती थी, माला जपती रहती थी.. माँ ने कभी पिताजी (दादा जी ) के बारे में बातें नहीं कीं. किसी से भी नहीं. अगर माँ करना भी चाहती तो क्या हम करते... कोई बेटा किसी दिन उनके पास बैठ कर पूछता की माँ आपको पिताजी की याद तो आती होगी, उनका कोई किस्सा ही सुना दो, माँ पिताजी की कौनसी बात आपको सबसे ज्यादा याद आती है, माँ पिताजी आपको क्या कह कर बुलाते थे, या माँ अब पिताजी के जाने के बाद आप अपना जीवन कैसे बिताना चाहते हो....... नहीं न....... माँ के लिए सब कुछ तय था, माँ भगवान में मन लगाएगी, घर में रहेगी तो आने जाने वाले की खबर रखेगी, बाल बच्चों की रखवाली करेगी, स्नान ध्यान पूजा पाठ के साथ साथ माँ एकादशी के व्रत करेगी, माँ अपने बेटों के लिए, उनके परिवारों के लिए राम नाम की मालाएं फेरेंगी......

आज सोचती हूँ बीस सालों से भी ज्यादा लम्बा वैधव्य, माँ ने कैसे काटा होगा, मंदिर में जाने से भी वो टोक दी जाती थी क्योंकि उसका औचित्य लोगों को समझ नहीं आता था...... पर यह किसी को कभी समझ नहीं आया होगा की माँ के लिए फाग के क्या मायने थे.......  दरअसल हमने, हमारी मवाद भरी व्यवस्थाओ ने माँ के पास कुछ नहीं छोड़ा था सिवाए गोविंद के, तुलसी की मालाओं के, एकादशी के व्रतों के, मंगला आरतियों के, बरामदों में लगे तख्तों के, मैरून सूती कपड़ों के........ पर माँ करती थी अपने हिस्से का विद्रोह, बेटों की परवाह किये बगैर माँ लड़ झगड़ के सबसे देख आती थी फाग, माँ जी लेती थी चुटकी भर जिंदगी रंगो को दूर से ही देखकर.............

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