बेचारे पुरूष!!
भिन्डी में अजवाइन और रायते में साबुत धनिये का छोंक तो मैं लगा दूँगी,
यह कोशिश भी कर लूंगी की हर फुल्का पूरा फूले,
प्याज काटना और आचार पापड़ रखना भी नहीं भूलूंगी,
पास बैठकर जिमाउंगी तुम्हे ..........
लेकिन तुम्हे नहीं परोसूंगी अपने अंतस का एक भी विचार,
मुझे तुम्हारी समीक्षाएं नहीं चाहिए.....
बेचारे पुरुष!
..........................
तुम मुझे स्त्री से व्यक्ति कभी नहीं होने दोगे न ......
तो सुनो! मैं भी तुम्हे सिर्फ पुरुष ही कहूँगी....
मुझे स्त्री रखने को तुम भी व्यक्ति न हो पाओगे....
रह जाओगे ..
बेचारे पुरुष....
------------------------------ -------------------------
तुम न नाराज़ मत हुआ करो,
मैं अक्सर बातें भूल जाती हूँ.
अच्छा सुनो! वो तुम ने कहा था न,
तुम्हे अच्छा लगेगा,
मेरा अचानक तुमसे आकर कहना...
मैं भूल गई हूँ, एक बार फिर से बता दो न,
दिन में कितनी बार और कब कब,
खली पेट या खाना खिलाने के बाद और किस तरह कहना है.....
आई लव यू!!!
------------------------------ ----------
हाँ मैं स्त्री हूँ,
और त्रिया चरित्र भी,
क्या करूँ की मेरी छोटी से छोटी बात तुम्हे समझ नहीं आती,
मैं कहती हूँ की मुझे सांस नहीं आ रही,
तुम कहते हो की मैं पागल हूँ,
सोचना बंद कर दूँ....
तुम हंस देते हो मुझ पे,
मेरे पागलपन के किस्सों पे,
और तुम्हारे उस अट्टहास के बीच मैं सोचना बंद नहीं कर पाती....
और पागल हो उठती हूँ...
कर देती हूँ टुकड़े तीन अपनी हर एक बात के....
और फिर तीन भांत की बात करती हूँ मैं .......
मैं हूँ त्रिया चरित्र .........
मेरे जीने की और तुम्हारे होने की सूरत है यह .........
------------------------------ ------------------------------ ----
अब क्या कहूँ मैं तुम्हारे पौरुष को,
की बहुत कुछ अनछुआ है अब भी मेरे भीतर.....
------------------------------ ---------------------
जो कही होती गीता किसी स्त्री ने कभी
तो कहती आत्माएं सब मर जाती हैं,
बस देह अमर रहती हैं.......
------------------------------ -----------
बस एक वहीँ आकर तो तुम सब कुछ हार जाते हो,
बस वहीँ आकर तो मैं सब कुछ जीत जाती हूँ,
मैं सब देकर भी रीतती नहीं...
तुम सब पाकर भी धापते नहीं...
पता है क्यों.... बेचारे पुरुष!
क्योंकि मैं स्त्री हूँ , और मैं केवल देह नहीं हूँ......