हर उनींदी सुबह सपनों की तपिश को कम करती, हर थकी रात बेखबर की जीवन कहाँ जा रहा है, दुपहरियां शांत स्वीकृति जो जैसा है उसे वैसा रहने देने की, लेकिन शामें होती हैं, मेरी अपनी, शैतान बच्चे सी बेचैन जिन्हे सबकुछ पाना है..............................
शामें बहकाती रहती हैं, शामें तड़पाती हैं, कुछ कर गुजरने को उकसाती हैं........... शामें होती हैं जो आ खड़ी होती हैं जीवन की एकरसता के सामने प्रश्न बनकर...............और मैं पार्क से बच्चों को खेल खिलाकर लाते हुए रोज़ अपनी शामों से वादा करती हूँ................. आज ज़रूर कुछ लिखूंगी..........
पर लिखना ही क्यों ? .............. मुझे लिखना नहीं आता, मैं घंटों पेन पेपर लेकर बैठी रहती हूँ, सोचती रहती हूँ की क्या लिखूं, कहाँ से शुरू करूँ ...कहाँ रुकूँ.... कहाँ पहुँचूँ .........सारे ख़याल उलझ जाते हैं.... सब कुछ एक दुसरे से गुंथा हुआ.... अलग अलग कुछ नहीं सोच पाती..... या तो सब कुछ एक साथ सोचना चाहती हूँ, कहना चाहती हूँ, या फिर कुछ नहीं सोचना चाहती, कुछ नहीं कहना चाहती... लिखना नहीं आता ... फिर भी सिर्फ लिखना और लिखते रहना चाहती हूँ......
क्यों लिखना है........ क्या है जो अब मेरे सिस्टम में एडजस्ट नहीं हो रहा है..... क्या है जो अब मुझे सिस्टम में एडजस्ट नहीं होने दे रहा है..... ३० सालों की ज़िन्दगी के वो कौन से अनुभव हैं जो बेचैन हो रहे हैं सबसे साझा होने के लिए..... रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में किश्त दर किश्त क्या इकठ्ठा होता चला जा रहा था जो अब पकी हुई फसल सा तैयार खड़ा है शब्दों में आटे की तरह गूँथ कर और किसी दुस्साहस की आग में सिक कर, परोसे जाने को विवश भी और लालायित भी.........
कौन सी बातें हैं जो मैं कह नहीं पाई...... जिन्होंने कहने लिखने की मेरी इच्छा को अब मेरी ज़रुरत बना दिया..... कौन सी बातें है जो मन पर उधार की तरह चढ़ती ही चली गई......... कितनी बातें करती हूँ मैं .....बीते सालों के फ़ोन के बिल देखकर तो कोई सोच भी नहीं सकता की अब भी कुछ बचा रह गया है कहने लिखने को ............ तो फिर कैसा ऋण है यह खुद का खुद पर जो लिख कर ही चुकाया जा सकता है .........
सब की ख़ुशी देखते रहने और लकीर पर सीधा सीधा जीने में जो सबसे ज़्यादा आहत होता रहा वो मन कभी तो ढेर सारे प्रश्नो को साथ लेकर आता ही....... सो आ गया है ....... खटखटा रहा है अनदेखे प्रतिबंधों के द्वार ......... उसे पता है की दोनों बच्चे स्कूल जाने लगे हैं और मुझे वक़्त मिलने लगा है....... अब मैं वक़्त की कमी का बहाना नहीं कर सकती ....... अब तो मुझे सारे जवाब चुकाने ही होंगे.......... मैंने कह दिया है उससे तुम आ जाओ ....... मैं तैयार हूँ............ उऋणी होने के लिए..............लिखने के लिए ..........