Sunday, 28 September 2014

गरीब की छबड़ी में रखी रोटी हुए मेरे शब्द.......

भूल जाती हूँ अक्सर कहते कहते,
गुम हो जाते हैं शब्द कहीं....
अनकही बातों के पर अनगिनत अर्थ निकल आते हैं,......................

मैं वक़्त के सिरे में नयी बात पिरोती हूँ,
और
अर्थ को कहती हूँ की कुछ शब्द ढूंढ लाये.............

गरीब की छबड़ी में रखी रोटी हुए मेरे शब्द,
मन की बात कहने को कभी पूरे नहीं पड़ते.................

तुम पूछते रहते हो न की आखिर क्या करती हूँ मैं दिन भर..........

मेरे कुछ शब्द खो गए हैं,
मैं वो शब्द खोजती हूँ..............................

Saturday, 27 September 2014

मैं उऋणी होने के लिए लिख रही हूँ .....

हर उनींदी सुबह सपनों की तपिश को कम करती, हर थकी रात बेखबर की जीवन कहाँ जा रहा है, दुपहरियां शांत स्वीकृति जो जैसा है उसे वैसा रहने देने की, लेकिन शामें होती हैं, मेरी अपनी, शैतान बच्चे सी बेचैन जिन्हे सबकुछ पाना है..............................


शामें बहकाती रहती हैं, शामें तड़पाती हैं, कुछ कर गुजरने को उकसाती हैं........... शामें होती हैं जो आ खड़ी होती हैं जीवन की एकरसता के सामने प्रश्न बनकर...............और मैं पार्क से बच्चों को खेल खिलाकर लाते हुए रोज़ अपनी शामों से वादा करती हूँ................. आज ज़रूर कुछ लिखूंगी..........

पर लिखना ही क्यों ?  .............. मुझे  लिखना नहीं आता, मैं घंटों पेन पेपर लेकर बैठी रहती हूँ, सोचती रहती हूँ की क्या लिखूं, कहाँ से शुरू करूँ ...कहाँ रुकूँ.... कहाँ पहुँचूँ .........सारे ख़याल उलझ जाते हैं.... सब कुछ एक दुसरे से गुंथा हुआ.... अलग अलग कुछ नहीं सोच पाती..... या तो सब कुछ एक साथ सोचना चाहती हूँ, कहना चाहती हूँ, या फिर कुछ नहीं सोचना चाहती, कुछ नहीं कहना चाहती... लिखना नहीं आता ... फिर भी सिर्फ लिखना और लिखते रहना चाहती हूँ......

क्यों लिखना है........ क्या है जो अब मेरे सिस्टम में एडजस्ट नहीं हो रहा है..... क्या है जो अब मुझे सिस्टम में एडजस्ट नहीं होने दे रहा है..... ३० सालों की ज़िन्दगी के वो कौन से अनुभव हैं जो बेचैन हो रहे हैं सबसे साझा होने के लिए..... रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में किश्त दर किश्त क्या इकठ्ठा होता चला जा रहा था जो अब पकी हुई फसल सा तैयार खड़ा है शब्दों में आटे की तरह गूँथ कर और  किसी दुस्साहस की आग में सिक कर, परोसे जाने को विवश भी और लालायित भी.........

कौन सी बातें हैं जो मैं कह नहीं पाई...... जिन्होंने कहने लिखने की मेरी इच्छा को अब मेरी ज़रुरत बना दिया..... कौन सी बातें है जो मन पर उधार की तरह चढ़ती ही चली गई......... कितनी बातें करती हूँ मैं .....बीते सालों के फ़ोन के बिल देखकर तो कोई सोच भी नहीं सकता की अब भी कुछ बचा रह गया है कहने लिखने को ............ तो फिर कैसा ऋण है यह खुद का खुद पर जो लिख कर ही चुकाया जा सकता है .........

सब की ख़ुशी देखते रहने और लकीर पर सीधा सीधा जीने में जो सबसे ज़्यादा आहत होता रहा वो मन कभी तो ढेर सारे प्रश्नो को साथ लेकर आता ही....... सो आ गया है ....... खटखटा रहा है अनदेखे प्रतिबंधों के द्वार ......... उसे पता है की दोनों बच्चे स्कूल जाने लगे हैं और मुझे वक़्त मिलने लगा है....... अब मैं वक़्त की कमी का बहाना नहीं कर सकती ....... अब तो मुझे सारे जवाब चुकाने ही होंगे.......... मैंने कह दिया है उससे तुम आ जाओ ....... मैं तैयार हूँ............ उऋणी होने के लिए..............लिखने के लिए .......... 

Friday, 5 September 2014

मैं आज भी प्रश्न हूँ...........




वो पहाड़ आज भी उस खिड़की के सामने खड़ा है,
जिस खिड़की के इस पार मैंने तुमसे पहाड़ों से प्रश्न पूछे थे कभी,
उस दिन मेरे हर प्रश्न का उत्तर था तुम्हारे पास,
मैं प्रश्न पूछती रही
तुम उत्तर देते रहे
मैं पूछते पूछते खुद प्रश्न बन गई,
तुम उत्तर देने के क्रम में खुद उत्तर बन गए
मैं आज भी प्रश्न हूँ,
तुम आज भी उत्तर बन के मुन्तजिर खड़े हो मेरे लिए .............................................

दृश्य

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