Friday, 5 September 2014

मैं आज भी प्रश्न हूँ...........




वो पहाड़ आज भी उस खिड़की के सामने खड़ा है,
जिस खिड़की के इस पार मैंने तुमसे पहाड़ों से प्रश्न पूछे थे कभी,
उस दिन मेरे हर प्रश्न का उत्तर था तुम्हारे पास,
मैं प्रश्न पूछती रही
तुम उत्तर देते रहे
मैं पूछते पूछते खुद प्रश्न बन गई,
तुम उत्तर देने के क्रम में खुद उत्तर बन गए
मैं आज भी प्रश्न हूँ,
तुम आज भी उत्तर बन के मुन्तजिर खड़े हो मेरे लिए .............................................

3 comments:

  1. प्रश्न ही बन गया उत्तर भी !

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  2. Waah bahut sunder prastuti..!!

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  3. अत्‍यंत भावपूर्ण कविता

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