Thursday, 27 February 2020

दृश्य

जोड़ी अच्छी है 

लड़के ने पढ़ी दुर्गासप्तशती 
पत्नी मनोरमाम देही, मनोवृतानुसारिणिम 
लड़की ने पढ़ा संविधान 
अनुच्छेद 14, 19 और 21 
कि मन, प्राण, देह और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबको है
पंडित ने कहा कुंडली मिल गई 
घर वालों ने कहा जोड़ी अच्छी है 
लोग जीम कर चले गए।। 

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संस्कार

एक ने पहनी थी लूंगी और बनियान, 
एक ने पहने जॉकी के शॉर्ट्स और टीशर्ट 
तीसरे ने मां का लाया बरमूडा और कॉलर वाली टीशर्ट 
गर्मियों की एक शाम को कूलर के सामने लगी थी बैठक
गपशप की, चाय नाश्ता किया, 
मनु के नियम दोहराए गए थोड़ी ऊंची आवाज में।
सबने माना कि चाय अच्छी बनी है, 
लेकिन कुछ कम है बहू में संस्कार,
उसका घूंघट इधर उधर हो जाता है कई बार।।

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बलात्कार

हो सकता है कि एक दिन उसका बलात्कार हो जाए, 
ऐसा कहीं भी और कभी भी हो सकता है,
कोई भी कर सकता है, 
घर और बाहर की तमाम सतर्कताओं के बावजूद हो सकता है, 
वह शपथ लेती है कि 
उस दिन किसी के पास रोने नहीं जाएगी, 
लेकिन कोई चाहे यह ना चाहे 
वह अपना हर कदम अब आगे बढ़ाएगी ।।

Wednesday, 3 July 2019

बेचारे पुरूष!!

बेचारे पुरूष!!

भिन्डी में अजवाइन और रायते में साबुत धनिये का छोंक तो मैं लगा दूँगी,
यह कोशिश भी कर लूंगी की हर फुल्का पूरा फूले,
प्याज काटना और आचार पापड़ रखना भी नहीं भूलूंगी,
पास बैठकर जिमाउंगी तुम्हे ..........
लेकिन तुम्हे नहीं परोसूंगी अपने अंतस का एक भी विचार,
मुझे तुम्हारी समीक्षाएं नहीं चाहिए.....
बेचारे पुरुष!
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तुम मुझे स्त्री से व्यक्ति कभी नहीं होने दोगे न ......
तो सुनो! मैं भी तुम्हे सिर्फ पुरुष ही कहूँगी....
मुझे स्त्री रखने को तुम भी व्यक्ति न हो पाओगे.... 
रह जाओगे ..
बेचारे पुरुष....


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तुम न नाराज़ मत हुआ करो,
मैं अक्सर बातें भूल जाती हूँ.
अच्छा सुनो! वो तुम ने कहा था न,
तुम्हे अच्छा लगेगा,
मेरा अचानक तुमसे आकर कहना...
मैं भूल गई हूँ, एक बार फिर से बता दो न,
दिन में कितनी बार और कब कब, 
खली पेट या खाना खिलाने के बाद और किस तरह कहना है.....
आई लव यू!!!

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हाँ मैं स्त्री हूँ,
और त्रिया चरित्र भी,
क्या करूँ की मेरी छोटी से छोटी बात तुम्हे समझ नहीं आती,
मैं कहती हूँ की मुझे सांस नहीं आ रही, 
तुम कहते हो की मैं पागल हूँ,
सोचना बंद कर दूँ....

तुम हंस देते हो मुझ पे,
मेरे पागलपन के किस्सों पे,
और तुम्हारे उस अट्टहास के बीच मैं सोचना बंद नहीं कर पाती.... 
और पागल हो उठती हूँ...
कर देती हूँ टुकड़े तीन अपनी हर एक बात के....
और फिर तीन भांत की बात करती हूँ मैं .......
मैं हूँ त्रिया चरित्र .........
मेरे जीने की और तुम्हारे होने की सूरत है यह .........
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अब क्या कहूँ मैं तुम्हारे पौरुष को,
की बहुत कुछ अनछुआ है अब भी मेरे भीतर.....


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जो कही होती गीता किसी स्त्री ने कभी 
तो कहती आत्माएं सब मर जाती हैं,
बस देह अमर रहती हैं.......

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बस एक वहीँ आकर तो तुम सब कुछ हार जाते हो,
बस वहीँ आकर तो मैं सब कुछ जीत जाती हूँ,
मैं सब देकर भी रीतती नहीं...
तुम सब पाकर भी धापते नहीं... 
पता है क्यों.... बेचारे पुरुष!
क्योंकि मैं स्त्री हूँ , और मैं केवल देह नहीं हूँ......

These guys Ram, Allah and Jesus...

"These guys Ram, Allah and Jesus . They are all good and they talk about love and peace. My understanding of religion is that I have no problem with these guys. I just want that there should be no mediators between me and them. I want to communicate with them directly. I just don't like when people try to scare me in the name of these guys. As simple as that."

That's how one of my polish friend concluded her views on religion.

Friday, 24 November 2017

मैं एक बेहतर इंसान बनना चाहता हूं


कभी हम सब कुछ हैं, कभी हम कुछ भी नहीं....... टॉम आल्टर


टॉम आल्टर से यह बातचीत मैंने कई सालों पहले पत्रकारिता और लेखन की अपनी छोटी सी किश्त के दौरान की थी, जो की अहा ज़िन्दगी फरवरी २००६ के अंक में प्रकाशित भी हो गई थी. पर फेसबुक माध्यम ही कुछ ऐसा है की बच्चों के स्कूल जाने के बाद पुरानी डायरियां और फाइलें निकाल कर फिर से पढ़ने...... और अपने लिखे की जुगाली करने का मन करता है....... खैर, इस बातचीत के बाद दो पंक्तियाँ मुझे अब तक हमेशा याद रहीं - "हम जो कुछ हैं सब कुछ हैं, हम जो कुछ हैं कुछ भी नहीं".................................




टॉम आल्टर की पैदाइश मसूरी में हुई. वो जब भी वहां जाते हैं तो भूल जाते हैं की उन्होंने कभी किसी फिल्म में काम किया है. मसूरी उनका घर है, जीवन है, जहाँ उन्होंने प्रेम किया, पाया और खोया भी. उस शहर के बारे में सोचने बैठते हैं तो समझ नहीं आता शुरुआत कहाँ से करें. दिल्ली से देहरादून पहुँचने के बाद राजपुर रोड पर चलकर डाक पट्टी पर गरमा-गरम चाय का प्याला और फिर वहां से मसूरी तक पंद्रह किलोमीटर का पैदल सफर. सर्दियों या अक्टूबर के महीने में खूबसूरत और शांत वादियों के बीच से गुज़रना. वो अक्सर वहां जाना चाहते हैं.जब लोग वहां उनके ऑटोग्राफ लेने आते हैं, या उनके साथ तस्वीर निकलवाते हैं, तब कभी कभी वो सोचते हैं की अभी उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया की लोग उनका ऑटोग्राफ लें और उनका दिल कह उठता है, अरे यार! यहाँ मुझे आराम से जीने दो. और दुसरे ही पल वो सोचते हैं की आदमी तो है ही एक तमाशा. कभी कभी तमाशाई बनने और खुद को तमाशाई देखने में उन्हें बड़ा आनंद आता है. 

अपने ईश्वर को वो कई रूपों में देखते हैं. उनके लिए कभी वो एक खूबसूरत ख्याल होता है, कभी कोई दोस्त, कभी मेहबूबा, कभी कोई नज़्म, और कभी कोई तस्वीर. कभी कभी वो खुद अपने ईश्वर से शिकायत करते हैं की अगर तुम हो तो फिर इस दुनिया में इतनी वाहियात चीज़ें क्यों हैं...................

जैसा की होता ही है, उनकी  ज़िन्दगी में भी ज़बरदस्त संघर्ष रहा जो आज तक चल रहा है. उनके  ख़याल में अगर इंसान ने संघर्ष नहीं किया तो फिर क्या किया. सिर्फ पैसे या दौलत या नाम के लिए नहीं बल्कि  अपने चाहे गए अंदाज़ में ज़िन्दगी जीने की कश्मकश और जद्दोजहद ही तो संघर्ष है. और अगर आदमी संघर्ष कर रहा है तो इसका मतलब है कोई शून्य, कोई खालीपन तो है वर्ना वो संघर्ष क्यों करेगा. शून्य बड़ा सच है. ज़िन्दगी बहुत बड़ा भ्रम है लेकिन उन्हें  लगता है की जब हम कोई अच्छा काम कर रहे होते हैं तब हम शायद भ्रम में नहीं होते.

नोबेल पुरस्कार विजेता अर्नेस्ट हेमिंग्वे की किताब "दी ओल्डमैन इन दी सी" उनकी ज़िन्दगी की वो पहली किताब थी जिससे वो  बेहद मुत्तसिर हुए  और इस तरह किताबों, लफ़्ज़ों के भरे पूरे संसार से उनका  परिचय हुआ. मिर्ज़ा ग़ालिब, टी एस इलियट, फिलिन थॉमस, फैज़ अहमद फैज़, उन्हें  न केवल खूब पसंद हैं बल्कि उनकी ज़िन्दगी का  हिस्सा हैं. फिल्मों में उन्हें  लगान, आनंद, तीसरी कसम, गंगा जमुना, लॉरेंस अरबिया, बेहद पसंद हैं. साथी कलाकारों में जिनके  नाम सबसे पहले याद आते हैं वो हैं, नसीरुद्दीन शाह, किट्टू गिडवानी, राधा सेठ, मंगल. लेकिन आज के ज़माने में वो  सबसे ज्यादा जिनसे मुत्तसिर होते हैं  वो हैं - गुलज़ार. गुलज़ार साहेब से दोस्ती भी है और उनको मानते भी खूब हैं. क्रिकेटर राहुल द्रविड़, अभिनेता पंकज कपूर, अभिनेत्री वहीदा रेहमान, तब्बू,  भी उनके  पसंद के लोग हैं. मोहम्मद रफ़ी हमेशा से उनके  पसंद के गायक रहे है और वासु भट्टाचार्य की फिल्मे भी वो  बेहद आग्रह से देखते हैं. ...................... 

टॉम बेहद भाग्यशाली रहे की जिन लोगों से वो  मिलना चाहते थे या जिनके साथ काम करना चाहते थे उन सभी लोगों से मिले और साथ काम किया. यही बात उन्हें जीवन में पूर्ण संतुष्टि देती है. उनका विचार है की कलाकार तारीफ का भूखा नहीं होता, क़द्र का भूखा होता है. जब आप कुछ अच्छा करते हैं और क़द्र नहीं होती तो गुस्सा आता है. आजकल रातोंरात सफलता पाने की कोशिश एक रोग का रूप इख्तियार कर चुकी है, उनके  ख़याल से यह सिर्फ अभिनेता और कलाकारों तक ही सीमित नहीं है, पूरे समाज में यह रोग ज़बरदस्त फैला है. कुछ हासिल करने के लिए जितना होमवर्क और मेहनत ज़रूरी है लोग नहीं करना चाहते. दो चार साल किसी भी क्षेत्र में बिताकर उसे एक पूरा करियर मान लेते हैं. जबकि ज़िन्दगी की नीवं मज़बूत करने के लिए साल दो साल का समय एक क़तरा, एक तिनका भी नहीं. तीस साल की मेहनत मशक्कत के बाद भी वो खुद को एक विद्यार्थी महसूस करते हैं. अभिनय, लेखन, पत्रकारिता कुछ भी हो अंत में आप अपने तजुर्बों को ही रूप दे रहे होते हैं. यही कला है. लेकिन अगर तजुर्बे नहीं हैं तो क्या पेश करेंगे....खालीपन ....

टॉम समझते हैं की आंसू भी ज़िन्दगी में उतने ही ज़रूरी हैं जितनी मुस्कुराहटें. और फिर अपने दोस्त की ग़ज़ल गुनगुनाने लगते  हैं......
क्यों हर  कतराए शबनम को तुम आंसूं समझते हो,
निचोड़ो शब की तारीकी से आंसू गर यह भी मंसूब है तुमको,
मगर शबनम तो एक नन्हा सा गह्वार है किरणों का.
तो आंसूं को क्यों हम सिर्फ उदासी या मायूसी की नज़र से देखते हैं, वो एक ऐसी चीज़ है जिससे सुबह की किरणें पैदा हो जाती हैं. और फिर आगे अपनी बात वो कुछ इस तरह समझाते हैं की जैसे खेत में बोये गए बीज को उगने के लिए पानी चाहिए वैसे ही आदमी की फितरत को आंसूं चाहिए. 

बच्चों की बात चलने पर वो कहते हैं की उनके ख़याल में एक सच्चा बाप, एक सच्ची माँ इस तरह से कभी नहीं सोचती की वो अपने बच्चे को क्या बनाएंगे. माँ बाप सिर्फ यही चाहते हैं की उनके बच्चे खुश रहें, अपनी मर्ज़ी के मुताबिक आज़ाद रहे, फिर वो चाहे टीचर बने, नर्स बने, या कुछ और............ 

टॉम के लिए उनकी माँ एक रज़ाई की तरह हैं, जब भी ठण्ड लगे, अकेलापन महसूस हो, वो उन्हें ओढ़ लेते हैं. उनके पिता एक पादरी थे. पैंतीस साल पहले उनका देहांत हुआ. अपने पिता को याद करते हुए वो बताते हैं की उनके पिता बहुत कम बात करते थे, और वो बच्चे लोग इस इंतज़ार में रहते थे की कब वे बोलें और वो उनसे कुछ सीख हासिल करें. अपने पिता से पांच मिनट की अंतिम मुलाक़ात उन्हें कभी नहीं भूलती जब उन्होंने कहा - टॉम हम तुम्हारे लिए कुछ पैसा नहीं छोड़ के जा रहे. हमें इसका अफ़सोस है. और टॉम ने कहा - जो आप छोड़कर जा रहें हैं उसके सामने पैसा क्या चीज़ है.

जहां आंसूं होते हैं वहां सपने भी तो होते हैं, टॉम भाग्यशाली रहे की उनके कई सपने पूरे हुए. और यूँ देखा जाये तो हर नया दिन एक नया सपना है. मसलन टॉम कुछ फ़िल्में निर्देशित करना चाहते हैं. खूब लिखना चाहते हैं... उनकी किताबों  री रन एट रिआल्टो, द लांगेस्ट रेस.......के अलावा उन्होंने क्रिकेट पर भी खूब लिखा है........ उनकी ख्वाहिश है की हर रोज़ वो और बेहतर कलाकार, और बेहतर अभिनेता, और बेहतर पिता, और बेहतर साथी,  और बेहतर इंसान बनते चले जाएँ........................... 

Friday, 29 January 2016

आखिरी बार कब महसूस किया तुमने की तुम ज़िंदा हो?



ज़िन्दगी को सर पर पड़ गए किसी अनचाहे काम की तरह, दिन बा दिन निबटाते हुए कभी सोचा है, आखिरी बार कब किया था कोई विरोध तुमने? कब कहा था किसी गलत को गलत, कब इंकार करके चुनौती दी थी कि जाओ! नहीं करना तो नहीं करना.. बिगाड़ लो जो बिगाड़ सकते हो!! आखिरी बार कब किसी से असहमति को दर्ज किया था? कब तोडा था आखिरी बार चेतना का मौन? कब किया व्यवस्थाओं का उपहास? या फिर कब रोईं इन गिच गिच रूढ़ियों और मान्यताओं के दल दल में डूबकर मर चुकी मनुष्यता पर? आखिरी बार कब हुईं रात रुदाली तुम? कब सुनी अपनी आवाज़ आखिरी बार कुछ याद करो? कब किया था कोई प्रश्न आखिरी बार किसी की आँखों में आँखें डाल कर? आखिरी बार कब चलीं तुम स्वाभिमान से भरी तनी हुई चाल? भय के, असुरक्षा के सब घूंघट हटा कर कब किया था आखिरी बार अभिव्यक्त खुद को? आखिरी बार कब, जब चुप रहना सुविधा हो तब कहना चुना था? आखिरी बार कब चुना था भीड़ से अलग खड़ा होना,
और कब चुना था जागना जब चद्दर तान कर सोये रहने का विकल्प रहा हो पास ?
आखिरी बार कब चुना था तुमने लड़ना और विद्रोह करना सोचो याद करो .... आखिरी बार कब महसूस किया तुमने की तुम ज़िंदा हो?

Thursday, 28 January 2016

लड़की अब राजनीति समझती है.........

लड़की हंसती है 

लड़की हंसती है हर बार,
जब कोई कहता है --
तुम बहुत भोली हो और दुनिया बहुत खराब
लड़की हंसती है क्योंकि जानती है वो
की ना तो दुनिया इतनी बुरी है,
ना ही वो बहुत भोली,
लड़की अब राजनीति समझती है.........

Friday, 13 February 2015

फागण आयो....

                                                                (चित्र गूगल से साभार )


फागण आयो फागणो रंगा दे रसिया म्हारा मन बसिया फागण आयो.........

फागुन में फाग की याद के साथ सबसे ज्यादा याद आती है माँ (दादी माँ) ..... माँ बेचैन रहती थी... खासकर फागुन के मौसम में.... चार चार बेटों के भरे पूरे परिवार में माँ बेचैन रहती थी..... कहीं कोई बाहर जाने को टोक न दे.... मंदिर में फाग के कारण जो भीड़ भड़क्का होने वाला होता उसके कारण कोई घर पर ही बैठे रहने को न कह दे, ... रोज़ अलग अलग कार्यक्रम और उतनी ही अलग अलग झांकियां.... माँ किसी को नाराज़ भी नहीं करना चाहती थी.... पर फाग भी देखने जाना चाहती थी... मुश्किल बस इतनी होती थी की हम सब एक सुर में कह देते थे -- माँ क्या करोगी जाकर....., बेटे आते जाते टोक देते थे... क्या करेगी माँ मंदिर जाकर ... घर बैठ कर ही राम राम कर ले ..... फिर भी माँ हारती नहीं थी.... बेटों के ऑफिस जाने के बाद माँ किसी न किसी बच्चे को साथ लेकर फाग देखने ज़रूर जाती.... थोक के भाव में घर में बच्चे थे...... इसी क्रम में मैं कई बार उनके साथ गोविन्द देव जी गई .... फाग देखा....

फाग का मौसम तो यादों का मौसम होता ही है....... विरह भी इस मौसम में वैसे ही अधिक दुखता है जैसे बारिश के मौसम में टूटी हुई किसी हड्डी में टीस उठती हो...... अब माँ नहीं है, पर फाग अभी भी हो रहा होगा......... लोग गोविन्द पर गुलाल फेंक फेंक कर गा रहे होंगे.... फागण आयो फागणो रंगा दे रसिया म्हारा मन बसिया फागण आयो.........अब तो माँ गोविन्द के पास ही है, अब कोई नहीं टोकता होगा उसे, माँ खेलती होगी खुलकर फाग अपने गोविन्द के साथ. .... माँ चार चार बेटों की माँ, पिताजी के जाने के बाद, घर के बाहर एक तख्ते पर बैठी रहती थी, माला जपती रहती थी.. माँ ने कभी पिताजी (दादा जी ) के बारे में बातें नहीं कीं. किसी से भी नहीं. अगर माँ करना भी चाहती तो क्या हम करते... कोई बेटा किसी दिन उनके पास बैठ कर पूछता की माँ आपको पिताजी की याद तो आती होगी, उनका कोई किस्सा ही सुना दो, माँ पिताजी की कौनसी बात आपको सबसे ज्यादा याद आती है, माँ पिताजी आपको क्या कह कर बुलाते थे, या माँ अब पिताजी के जाने के बाद आप अपना जीवन कैसे बिताना चाहते हो....... नहीं न....... माँ के लिए सब कुछ तय था, माँ भगवान में मन लगाएगी, घर में रहेगी तो आने जाने वाले की खबर रखेगी, बाल बच्चों की रखवाली करेगी, स्नान ध्यान पूजा पाठ के साथ साथ माँ एकादशी के व्रत करेगी, माँ अपने बेटों के लिए, उनके परिवारों के लिए राम नाम की मालाएं फेरेंगी......

आज सोचती हूँ बीस सालों से भी ज्यादा लम्बा वैधव्य, माँ ने कैसे काटा होगा, मंदिर में जाने से भी वो टोक दी जाती थी क्योंकि उसका औचित्य लोगों को समझ नहीं आता था...... पर यह किसी को कभी समझ नहीं आया होगा की माँ के लिए फाग के क्या मायने थे.......  दरअसल हमने, हमारी मवाद भरी व्यवस्थाओ ने माँ के पास कुछ नहीं छोड़ा था सिवाए गोविंद के, तुलसी की मालाओं के, एकादशी के व्रतों के, मंगला आरतियों के, बरामदों में लगे तख्तों के, मैरून सूती कपड़ों के........ पर माँ करती थी अपने हिस्से का विद्रोह, बेटों की परवाह किये बगैर माँ लड़ झगड़ के सबसे देख आती थी फाग, माँ जी लेती थी चुटकी भर जिंदगी रंगो को दूर से ही देखकर.............

दृश्य

जोड़ी अच्छी है  लड़के ने पढ़ी दुर्गासप्तशती  पत्नी मनोरमाम देही, मनोवृतानुसारिणिम  लड़की ने पढ़ा संविधान  अनुच्छेद 14, 19 और 21  ...