ज़िन्दगी को सर पर पड़ गए किसी अनचाहे काम की तरह, दिन बा दिन निबटाते हुए कभी सोचा है, आखिरी बार कब किया था कोई विरोध तुमने? कब कहा था किसी गलत को गलत, कब इंकार करके चुनौती दी थी कि जाओ! नहीं करना तो नहीं करना.. बिगाड़ लो जो बिगाड़ सकते हो!! आखिरी बार कब किसी से असहमति को दर्ज किया था? कब तोडा था आखिरी बार चेतना का मौन? कब किया व्यवस्थाओं का उपहास? या फिर कब रोईं इन गिच गिच रूढ़ियों और मान्यताओं के दल दल में डूबकर मर चुकी मनुष्यता पर? आखिरी बार कब हुईं रात रुदाली तुम? कब सुनी अपनी आवाज़ आखिरी बार कुछ याद करो? कब किया था कोई प्रश्न आखिरी बार किसी की आँखों में आँखें डाल कर? आखिरी बार कब चलीं तुम स्वाभिमान से भरी तनी हुई चाल? भय के, असुरक्षा के सब घूंघट हटा कर कब किया था आखिरी बार अभिव्यक्त खुद को? आखिरी बार कब, जब चुप रहना सुविधा हो तब कहना चुना था? आखिरी बार कब चुना था भीड़ से अलग खड़ा होना,
और कब चुना था जागना जब चद्दर तान कर सोये रहने का विकल्प रहा हो पास ?
आखिरी बार कब चुना था तुमने लड़ना और विद्रोह करना सोचो याद करो .... आखिरी बार कब महसूस किया तुमने की तुम ज़िंदा हो?
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