कभी हम सब कुछ हैं, कभी हम कुछ भी नहीं....... टॉम आल्टर
टॉम आल्टर से यह बातचीत मैंने कई सालों पहले पत्रकारिता और लेखन की अपनी छोटी सी किश्त के दौरान की थी, जो की अहा ज़िन्दगी फरवरी २००६ के अंक में प्रकाशित भी हो गई थी. पर फेसबुक माध्यम ही कुछ ऐसा है की बच्चों के स्कूल जाने के बाद पुरानी डायरियां और फाइलें निकाल कर फिर से पढ़ने...... और अपने लिखे की जुगाली करने का मन करता है....... खैर, इस बातचीत के बाद दो पंक्तियाँ मुझे अब तक हमेशा याद रहीं - "हम जो कुछ हैं सब कुछ हैं, हम जो कुछ हैं कुछ भी नहीं".................................
टॉम आल्टर की पैदाइश मसूरी में हुई. वो जब भी वहां जाते हैं तो भूल जाते हैं की उन्होंने कभी किसी फिल्म में काम किया है. मसूरी उनका घर है, जीवन है, जहाँ उन्होंने प्रेम किया, पाया और खोया भी. उस शहर के बारे में सोचने बैठते हैं तो समझ नहीं आता शुरुआत कहाँ से करें. दिल्ली से देहरादून पहुँचने के बाद राजपुर रोड पर चलकर डाक पट्टी पर गरमा-गरम चाय का प्याला और फिर वहां से मसूरी तक पंद्रह किलोमीटर का पैदल सफर. सर्दियों या अक्टूबर के महीने में खूबसूरत और शांत वादियों के बीच से गुज़रना. वो अक्सर वहां जाना चाहते हैं.जब लोग वहां उनके ऑटोग्राफ लेने आते हैं, या उनके साथ तस्वीर निकलवाते हैं, तब कभी कभी वो सोचते हैं की अभी उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया की लोग उनका ऑटोग्राफ लें और उनका दिल कह उठता है, अरे यार! यहाँ मुझे आराम से जीने दो. और दुसरे ही पल वो सोचते हैं की आदमी तो है ही एक तमाशा. कभी कभी तमाशाई बनने और खुद को तमाशाई देखने में उन्हें बड़ा आनंद आता है.
अपने ईश्वर को वो कई रूपों में देखते हैं. उनके लिए कभी वो एक खूबसूरत ख्याल होता है, कभी कोई दोस्त, कभी मेहबूबा, कभी कोई नज़्म, और कभी कोई तस्वीर. कभी कभी वो खुद अपने ईश्वर से शिकायत करते हैं की अगर तुम हो तो फिर इस दुनिया में इतनी वाहियात चीज़ें क्यों हैं...................
जैसा की होता ही है, उनकी ज़िन्दगी में भी ज़बरदस्त संघर्ष रहा जो आज तक चल रहा है. उनके ख़याल में अगर इंसान ने संघर्ष नहीं किया तो फिर क्या किया. सिर्फ पैसे या दौलत या नाम के लिए नहीं बल्कि अपने चाहे गए अंदाज़ में ज़िन्दगी जीने की कश्मकश और जद्दोजहद ही तो संघर्ष है. और अगर आदमी संघर्ष कर रहा है तो इसका मतलब है कोई शून्य, कोई खालीपन तो है वर्ना वो संघर्ष क्यों करेगा. शून्य बड़ा सच है. ज़िन्दगी बहुत बड़ा भ्रम है लेकिन उन्हें लगता है की जब हम कोई अच्छा काम कर रहे होते हैं तब हम शायद भ्रम में नहीं होते.
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्नेस्ट हेमिंग्वे की किताब "दी ओल्डमैन इन दी सी" उनकी ज़िन्दगी की वो पहली किताब थी जिससे वो बेहद मुत्तसिर हुए और इस तरह किताबों, लफ़्ज़ों के भरे पूरे संसार से उनका परिचय हुआ. मिर्ज़ा ग़ालिब, टी एस इलियट, फिलिन थॉमस, फैज़ अहमद फैज़, उन्हें न केवल खूब पसंद हैं बल्कि उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा हैं. फिल्मों में उन्हें लगान, आनंद, तीसरी कसम, गंगा जमुना, लॉरेंस अरबिया, बेहद पसंद हैं. साथी कलाकारों में जिनके नाम सबसे पहले याद आते हैं वो हैं, नसीरुद्दीन शाह, किट्टू गिडवानी, राधा सेठ, मंगल. लेकिन आज के ज़माने में वो सबसे ज्यादा जिनसे मुत्तसिर होते हैं वो हैं - गुलज़ार. गुलज़ार साहेब से दोस्ती भी है और उनको मानते भी खूब हैं. क्रिकेटर राहुल द्रविड़, अभिनेता पंकज कपूर, अभिनेत्री वहीदा रेहमान, तब्बू, भी उनके पसंद के लोग हैं. मोहम्मद रफ़ी हमेशा से उनके पसंद के गायक रहे है और वासु भट्टाचार्य की फिल्मे भी वो बेहद आग्रह से देखते हैं. ......................
टॉम बेहद भाग्यशाली रहे की जिन लोगों से वो मिलना चाहते थे या जिनके साथ काम करना चाहते थे उन सभी लोगों से मिले और साथ काम किया. यही बात उन्हें जीवन में पूर्ण संतुष्टि देती है. उनका विचार है की कलाकार तारीफ का भूखा नहीं होता, क़द्र का भूखा होता है. जब आप कुछ अच्छा करते हैं और क़द्र नहीं होती तो गुस्सा आता है. आजकल रातोंरात सफलता पाने की कोशिश एक रोग का रूप इख्तियार कर चुकी है, उनके ख़याल से यह सिर्फ अभिनेता और कलाकारों तक ही सीमित नहीं है, पूरे समाज में यह रोग ज़बरदस्त फैला है. कुछ हासिल करने के लिए जितना होमवर्क और मेहनत ज़रूरी है लोग नहीं करना चाहते. दो चार साल किसी भी क्षेत्र में बिताकर उसे एक पूरा करियर मान लेते हैं. जबकि ज़िन्दगी की नीवं मज़बूत करने के लिए साल दो साल का समय एक क़तरा, एक तिनका भी नहीं. तीस साल की मेहनत मशक्कत के बाद भी वो खुद को एक विद्यार्थी महसूस करते हैं. अभिनय, लेखन, पत्रकारिता कुछ भी हो अंत में आप अपने तजुर्बों को ही रूप दे रहे होते हैं. यही कला है. लेकिन अगर तजुर्बे नहीं हैं तो क्या पेश करेंगे....खालीपन ....
टॉम समझते हैं की आंसू भी ज़िन्दगी में उतने ही ज़रूरी हैं जितनी मुस्कुराहटें. और फिर अपने दोस्त की ग़ज़ल गुनगुनाने लगते हैं......
क्यों हर कतराए शबनम को तुम आंसूं समझते हो,
निचोड़ो शब की तारीकी से आंसू गर यह भी मंसूब है तुमको,
मगर शबनम तो एक नन्हा सा गह्वार है किरणों का.
तो आंसूं को क्यों हम सिर्फ उदासी या मायूसी की नज़र से देखते हैं, वो एक ऐसी चीज़ है जिससे सुबह की किरणें पैदा हो जाती हैं. और फिर आगे अपनी बात वो कुछ इस तरह समझाते हैं की जैसे खेत में बोये गए बीज को उगने के लिए पानी चाहिए वैसे ही आदमी की फितरत को आंसूं चाहिए.
बच्चों की बात चलने पर वो कहते हैं की उनके ख़याल में एक सच्चा बाप, एक सच्ची माँ इस तरह से कभी नहीं सोचती की वो अपने बच्चे को क्या बनाएंगे. माँ बाप सिर्फ यही चाहते हैं की उनके बच्चे खुश रहें, अपनी मर्ज़ी के मुताबिक आज़ाद रहे, फिर वो चाहे टीचर बने, नर्स बने, या कुछ और............
टॉम के लिए उनकी माँ एक रज़ाई की तरह हैं, जब भी ठण्ड लगे, अकेलापन महसूस हो, वो उन्हें ओढ़ लेते हैं. उनके पिता एक पादरी थे. पैंतीस साल पहले उनका देहांत हुआ. अपने पिता को याद करते हुए वो बताते हैं की उनके पिता बहुत कम बात करते थे, और वो बच्चे लोग इस इंतज़ार में रहते थे की कब वे बोलें और वो उनसे कुछ सीख हासिल करें. अपने पिता से पांच मिनट की अंतिम मुलाक़ात उन्हें कभी नहीं भूलती जब उन्होंने कहा - टॉम हम तुम्हारे लिए कुछ पैसा नहीं छोड़ के जा रहे. हमें इसका अफ़सोस है. और टॉम ने कहा - जो आप छोड़कर जा रहें हैं उसके सामने पैसा क्या चीज़ है.
जहां आंसूं होते हैं वहां सपने भी तो होते हैं, टॉम भाग्यशाली रहे की उनके कई सपने पूरे हुए. और यूँ देखा जाये तो हर नया दिन एक नया सपना है. मसलन टॉम कुछ फ़िल्में निर्देशित करना चाहते हैं. खूब लिखना चाहते हैं... उनकी किताबों री रन एट रिआल्टो, द लांगेस्ट रेस.......के अलावा उन्होंने क्रिकेट पर भी खूब लिखा है........ उनकी ख्वाहिश है की हर रोज़ वो और बेहतर कलाकार, और बेहतर अभिनेता, और बेहतर पिता, और बेहतर साथी, और बेहतर इंसान बनते चले जाएँ...........................

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