Thursday, 15 May 2014

लिखना ही बस आखिरी इलाज है .....




......................................................लिखना चाहकर न लिख पाना....... मानो जीवन जीना नहीं मन ही मन लिखते जाना है..... सब गुज़र रहा है.... और  सब लिखा जा रहा है... कभी कभी खुद को खींच लाती हूँ... खुद के जीवन में....... कभी कभी खुद को दूर ले जाती हूँ... खुद से , जीवन से, ......... जीवन सदैव जीवन से पर...... मैं कभी भी नहीं थी अपने जीवन में...... मैं तो दूर से देख रही थी..........उस लड़की को उसके जीवन को ........ उस जीवन को जिसे वो खुद जी ही नहीं रही थी........ मैं देख रही थी उसे उड़ते, फिर बंधते, धुनते, ............. मैं देख समझ रही थी उसके प्रतिबन्ध................ और प्रतिबंधों के बीच उसके उन्मुक्त मन को, प्रतिबन्ध तो वैसे भी शरीर के होते हैं, और व्यवस्थाएं ये बेहतर जानती हैं..... तभी तो आक्रमण उसके शरीर पे नहीं उसके मन, उसकी आत्मा, उसके विश्वास पर .................... की गर खिड़कियाँ दरवाज़े खुले मिल भी जाएँ तो वो एकबारगी कोशिश न कर सके बाहर झाँकने की............................

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