ताम्बे का एक लोटा,
बरसों भरा मैंने,
उनके आने से पहले उनके सिरहाने रखा,
यह एक काम मेरे हिस्से आया था,
यह एक काम मुझे बहुत अच्छा लगता था,
रोज़ मांज कर भर कर रख दिया करती थी,
उस दिन भी तो रखा था...........................
उस लोटे की भी एक तस्वीर बन गयी है मन में,
वो लोटा भी मानो वहीँ सिरहाने रखा,
अब तक इंतज़ार कर रहा है बाबूजी के आने का..........................
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