Friday, 18 July 2014

अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हूँ,..........

अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हूँ,
ताज़ा ताज़ा सूरज मिलता है,
खिला खिला आसमान,
बेरोक टोक साफ़ सोते हुए रास्ते,
अलसाई अंगडाई लेती पौधों फूलों की पत्तिया,
सुबह होने का उत्सव मनाते पक्षी,
और उनके गीतों को सुन जागती हुई पेड़ों की कतारें,
 इन सबके बीच रोज़ बड़ी शिद्दत से कुछ खोजती हूँ मैं..........

इन सबने मेरे बाबूजी को देखा है,
नीयम से हर सुबह कई सालों तक,
इन सबसे मिलवाना चाहते थे वो मुझे,
पर मैं सोई रही इतने सालों तक,
एक ऐसी नींद जो अक्सर किसी के जाने पे टूटती है,
नींद जो कुछ खो जाने पे टूटती है..........

अब नींदों ने मुझसे आग्रह करना छोड़ दिया है,
उन्होंने जाकर मेरे जीवन को ऐसा मोड़ दिया है,
अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हु,

सुबह सुबह वो मानो मुझसे मिलने आते हैं,
मेरी उंगली पकड़ते हैं मुझे चलना सिखाते हैं,
मेरी हिम्मत बंधाते हैं मुझे "दिनकर" सुनाते हैं,
अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हु,

सूरज के हाथ बाबूजी मुझे आशाएं भेजते हैं,
आसमान के हाथ मेरे लिए सपने,
हवाएं उनका आशीर्वाद लाती  हैं,
धीरे से मेरे सर पे हाथ फेर जाती हैं,
रास्ते उनकी तरह उम्मीद बढ़ाते हैं
चलते रहने का पाठ पढ़ाते हैं..........


अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हु,
और चाहकर भी वो सारी सुबहें भूल नहीं पाती हूँ,
जब नींदों में बाबूजी की आवाज सुनती थी,
आँखें मिचमिचा कर करवट बदल कर फिर सो जाती थी,
कल से कल से करके टाल जाती थी,
वो कल जो कभी आया ही नहीं,
वो कल जो अब कभी आ नहीं सकता,

अब रोज सुबह एक झटके से उठती हूँ,
सुबह के पहर में जो उनका आभास है, खोने से डरती हु,
इस तरह से अपने बाबूजी को मिल के आती हूँ,
और इसीलिए ............
अब रोज़ सुबह मैं सैर को जाती हूँ............... 

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